रविवार, 7 अप्रैल 2013

फिर खड़ा हो गुर्जर - पंकज गुर्जर


फिर खड़ा हो गुर्जर
तूँ इस धरा पे एक बार
छोड़ दे आलस्य यूँ
कमजोर हो ना बार बार
जम चुके लहूँ में
अब आने दे उबाल तूँ
शांति का त्याग कर ,
बन एक भूचाल तूँ
ठान ले अब मान ले ,
छोड़ के अभिमान तूँ
देश की शान है ,
तेग ऊँची तान तूँ
कदम कदम पे हो रहा,
अस्तित्व तेरा तार तार
फिर खड़ा हो गुर्जर
तूँ इस धरा पे एक बार
अपने भाइयों को तूं एक रख,
यूँ होने दे अनेक ना
सीने से लगा उन्हें ,
फिर अपनी ताकत को देख ना
घर कर चुकी बुराइयों को,
बस उखाड़ दे समाज से
शेर था तूं शेर है,
और सदा रहेगा शेरो वाले अंदाज से
त्राहि त्राहि दुश्मन करे ,
रोने लगे फिर जार जार
फिर खड़ा हो "वीर"
तूँ इस धरा पे एक बार
लेखक 
युवा विचारक है और गुर्जर विंदांस ग्रुप के एडमिन हैं

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