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गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

मंथन क्या इस लोकतंत्र में डंडा ही बलवान?



- देवेन्द्र स्वरूप
13 मई को जयपुर में 8 जगह जिहादी हमला, 70 निर्दोषों ने जान गंवाई, सैकड़ों घायल हुए, अरबों-खरबों का नुकसान हुआ। वीर भूमि राजस्थान की राजधानी लहूलुहान हो गयी। 23 मई को एक जनांदोलन का विस्फोट, राजस्थान की जनसंख्या के 5 प्रतिशत अर्थात् 25 लाख गुर्जर यकायक सड़क पर उतर आये। घुंघटधारी औरतें कतार लगाकर रेल पटरियों पर बैठ गर्इं। बड़े-बड़े पग्गड़ बांधे, घनी घहराती मूंछोवाले बुजुर्गों के नेतृत्व में नौजवानों ने राजमार्गों को बंद कर दिया, रेल की पटरियां उखाड़ डालीं, रेलों का आवागमन बाधित कर दिया। टेलीविजन चैनलों और अखबार के पन्नों पर छपी तस्वीरों को देखकर लगता है कि एक पूरी जाति युद्ध के मैदान में उतर आयी। सबके हाथों में हथियार हैं, लाठियां, बरछे, भाले यहां तक कि बंदूकें भी। वे युद्ध की पूरी रणनीति तैयार करके मैदान में उतर आए हैं। जवानों में युद्ध का जोश भरने के लिए शहादत की स्थिति पैदा करना जरुरी है, शहादत के लिये पुलिस को गोली वर्षा करने के लिए उत्तेजित करना अपरिहार्य है। इसलिये पटरी उखाड़ो, वाहनों को आग लगाओ, पुलिस पर पथराव करो, जब पुलिस गोली वर्षा करने के लिये मजबूर हो जाए तब उसकी गोली से मारे गये आंदोलनकारियों को शहीद घोषित करो, उनके शवों का अंतिम संस्कार मत होने दो। उन्हें बर्फ की सिल्लियों के साथ कई दिन तक बनाए रखो ताकि भीड़ में गुस्सा पैदा हो, उसका जोश उबाल खाता रहे। बयाना में 10, सिकंदरा में 7, करवारी में 5 शव बक्सों में बंद कतार बना कर रखे हुए हैं। प्रत्येक बक्से पर शव का नाम और शहीद लिखा हुआ है। ये शव सरकार की ह्मदयहीनता और गुर्जर जाति के प्रति शत्रु भाव के प्रमाण हैं, जो पूरी जाति को युद्ध की स्थिति में लाने की उत्तेजना पैदा कर रहे हैं।
गुर्जर जाति का इतिहास राष्ट्रीय संस्कृति और स्वतंत्रता के लिये वीरतापूर्वक संघर्ष और बलिदान का इतिहास रहा है। मुगल-तुर्क आक्रमणों के विरुद्ध उन्होंने शौर्य गाथाओं के अनेक पन्ने लिखे, 1857 की महाक्रांति में भी उन्होंने अंग्रेजों को नाकों चने चबवाये। क्या इस बार भी 13 मई के जिहादी हमले के जवाब में उनका पुरुषार्थ जागा है? क्या जिस हिन्दू समाज के ऊपर वह हमला हुआ, उसके वे अंग नहीं हैं? पर, उनका ये आंदोलन जिहादियों के विरुद्ध नहीं, अपनी ही सरकार के विरुद्ध है। सरकार ही क्यों, उनका हिंसक आंदोलन तो पूरे राष्ट्र के विरुद्ध दिखाई देता है। आखिर, रेलमार्ग और सड़क यातायात बाधित कर वे किसे दंड दे रहे हैं। क्या केवल सरकार को या उन लाखों-करोड़ों देशवासियों को जो किसी न किसी जरूरी काम से राजस्थान होकर दक्षिण से उत्तर और उत्तर से दक्षिण की ओर यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने गुर्जर जाति का कभी कुछ नहीं बिगाड़ा है तब उन्हें किस बात का दंड? क्या इसलिये कि वे मात्र राष्ट्र के अंग हैं उसी प्रकार जिस प्रकार गुर्जर जाति इस राष्ट्र का अंग है।
आरक्षण का भूत
आखिर, गुर्जर जाति का गुस्सा अपने ही देशवासियों के विरुद्ध क्यों जगाया जा रहा है? क्यों आंदोलन की आग देश की राजधानी दिल्ली में लगायी जा रही है? क्यों राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के चारों ओर नाकेबंदी करके राजधानी वासियों को सब्जी, दूध आदि आवश्यकताओं के लिये तरसाने की सगर्व घोषणाएं की जा रही हैं? हाथों में हथियार लिये नौजवानों के झुंड सब प्रमुख मार्गों की नाकाबंदी करते दिखाई दे रहे हैं? कहा जा रहा है कि यह गुर्जर महापंचायत का आदेश है। गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के चेयरमैन सेवानिवृत्त कर्नल करोड़ी सिंह बैंसला का आह्वान है। इसलिये आह्वान के लिये मर मिटना प्रत्येक गुर्जर का धर्म है। हमारी निष्ठा राष्ट्र के लिये नहीं, देशवासियों के लिये नहीं, अपनी महापंचायत और उस महापंचायत द्वारा नियुक्त नेता या डिक्टेटर के प्रति है। डिक्टेटर ने हमें कह दिया है कि जब तक राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे हमारे हाथ में दो लाइन की यह चिट्ठी नहीं थमा देती कि आज से गुर्जर जाति को अनुसूचित जनजाति की सूची में सम्मिलित कर लिया गया है तब तक हमारा संघर्ष चलता रहेगा। पिछले साल हमने 26 शहीद बनाये थे, इस बार अब तक 37 शहीद बन चुके हैं, जरूरत पड़ी तो अगली किश्त इससे भी बड़ी होगी।
तो यह लम्बा संघर्ष गुर्जर जाति को जनजाति का दर्जा दिलाने के लिये लड़ा जा रहा है। लगभग सौ साल पहले इसी गुर्जर समाज के नेताओं ने ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन दिये थे कि उनका स्थान अपराधी जनजाति सूची में नहीं, श्रेष्ठ क्षत्रिय वर्ग में होना चाहिए। स्वाधीन भारत ने 1950 में ब्रिटिश सरकार के अपराधी जनजाति अधिनियम-1871 को समाप्त करके उन्हें उस लांछित श्रेणी से मुक्ति दिलायी। पर, तब तक आरक्षण का एक नया भूत पैदा हो चुका था। इस भूत को जन्म देने का श्रेय भी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को जाता है। 1871 में दस वर्षीय जनगणना की प्रक्रिया को प्रारंभ करके उन्होंने भारत के राष्ट्रीय समाज की सीमाओं को संकुचित करना आरंभ किया। जनजातियों की गणना हिन्दू समाज से बाहर की। शेष हिन्दू समाज को भी सवर्ण, मध्यम एवं निम्न वर्गों में विभाजित किया। निम्न वर्ग को दलित वर्ग (डिप्रेस्ड क्लासेज) जैसा नाम दिया। उन्हें शेष समाज से अलग करके मुसलमानों और सिक्खों की तरह अलग मताधिकार देने का कुचक्र रचा जिसे विफल करने के लिये 1932 में पूना पैक्ट हुआ। इस पैक्ट के द्वारा दलित वर्गों को पृथक मताधिकार तो नहीं मिला पर आरक्षण का अधिकार मिल गया। 1935 के भारत सरकार एक्ट में आरक्षण का विधान प्रतिष्ठित हो गया। पर जनजातियों को ब्रिटिश शासकों ने 1935 के एक्ट के अन्तर्गत निर्वाचित सरकारों के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखकर प्रांतीय गवर्नरों के अधीन रखा। इस प्रकार आरक्षण के आधार पर दलित वर्गों की प्रांत स्तर पर अनुसूचियां बनीं और उन्हें अनुसूचित जातियां कहा जाने लगा। गांधी जी ने उनके लिए "हरिजन" शब्द चलाया और कुछ समय तक वह चला भी खूब। पर, 1932 में पूना पैक्ट भारतीय समाज को जाति के आधार पर विभाजित करने की अंग्रेजों की कूटनीति की विजय थी। क्योंकि आरक्षण सिद्धांत के कारण पृथक निर्वाचन का खतरा तो टल गया पर जाति चेतना ज्यों की त्यों बनी रह गयी बल्कि और गहरी होती चली गयी अर्थात् जाति विहीन समाज के निर्माण का सपना मात्र सपना रह गया। इसका एक परिणाम यह हुआ कि आरक्षण सिद्धांत के जन्म के पूर्व प्रत्येक जाति उच्च वर्गों में स्थान पाने के लिये आंदोलन कर रही थी वहीं बाद में आरक्षण की सुविधा पाने के लिये ऊंची जातियां भी अनुसूचित जाति या जनजाति की श्रेणी में स्थान पाने के लिये लालायित हो गयीं। आरक्षण की रेवड़ियां लूटने के लालच ने जातियों को एक दूसरे का प्रतिस्पर्धी भी बना दिया।
स्पर्धा एवं कटुता
राजस्थान में यही हुआ। वहां की मीणा एवं गुर्जर जातियां सैकड़ों साल से इकट्ठा रहती आ रही थीं। अंग्रेजों ने दोनों जातियों को अपराधी जनजाति श्रेणी में डाल दिया जबकि मीणा जाति कृषि के साथ-साथ चौकीदारी का काम करती थी। अत: 1955 के काका कालेलकर पिछड़े वर्ग आयोग ने उन्हें भूस्वामी होने के कारण पिछड़े वर्ग में ही रखने योग्य माना किंतु मीणा जाति के कुछ चतुर नेताओं ने बड़ी कुशलता से 1954 में अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के गठन के बाद जब अनुसूचित जनजातियों की सूचियां तैयार की जा रही थीं, राजस्थान में बसी "भील मीणा" जनजाति के नाम में हेराफेरी करके अपनी पूरी मीणा जाति को अनुसूचित जनजाति में सम्मिलित करा लिया। उन्होंने चतुराई यह की कि "भील मीणा" नाम में भील और मीणा शब्दों के बीच एक अर्ध विराम जोड़ दिया जिससे "भील मीणा" एक जनजाति का नाम न रहकर दो पृथक जातियों भील और मीणा का सूचक बन गया। इस कारण भीलों के साथ-साथ उत्तरी राजस्थान के किसान चौकीदार मीणा भी अनुसूचित जनजातियों की सूची में आ गये। आरक्षण की बैसाखी पर सवार होकर उन्होंने राजस्थान और केन्द्रीय प्रशासनिक सेवा और शिक्षा क्षेत्र में पर्याप्त स्थान प्राप्त कर लिये। यही मीणा और गुर्जर जातियों के बीच स्पर्धा व कटुता का कारण बन गया। आरक्षण की सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए गुर्जर नेताओं ने 1960 से ही अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने की मांग उठाना शुरु कर दिया। 1962 में सीकर कमेटी की रिपोर्ट ने गुर्जरों को जनजाति श्रेणी में रखने का कोई औचित्य नहीं देखा। न वे वनवासी हैं और न जनजाति। पर, उसी समय गुर्जरों से अधिक समृद्ध और विकसित मीणाओं को अनुसूचित जनजाति से बाहर निकालने का सुझाव किसी ने नहीं दिया। गुर्जरों को आरक्षण की सुविधा देने के लिये उन्हें 1993 में अन्य पिछड़े वर्गों में सम्मिलित कर लिया गया। पर, 1999 में वोट राजनीति के दबाव में जाटों को ओबीसी दर्जा दे दिया गया। जाटों के आ जाने से गुर्जरों की आरक्षण सुविधाओं का बड़ा हिस्सा जाटों के पास चला गया। पर अनुसूचित जनजाति की सुविधाओं पर मीणाओं का एकाधिकार और वर्चस्व बना रहा, आज भी बना हुआ है। मीणा युवक बड़ी संख्या में आई.ए.एस और आई.पी.एस बन चुके हैं, बन रहे हैं जिससे गुर्जरों में अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आने की छटपटाहट बढ़ गई। उन्होंने भी वोट बैंकों के हथियार का इस्तेमाल किया। जिसके कारण पिछले विधानसभा चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री पद की दावेदार ने उनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन दे दिया।
आश्चर्य यह है कि गुर्जर नेताओं ने इस आश्वासन को भाजपा सरकार का वचन मान लिया। उन्होंने एक बार भी नहीं सोचा कि किसी जाति को आरक्षित श्रेणी में सम्मिलित करने का अधिकार राज्य सरकार के पास नहीं होता, वह केवल अनुशंसा केन्द्र को भेज सकती है। केन्द्र उस पर अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग की सहमति प्राप्त करता है, उस सलाह के आधार पर मंत्रिमंडल की स्वीकृति प्राप्त करके उसे संसद में प्रस्तुत करता है। वैसे भी गुर्जर जाति की कुल जनसंख्या 1 करोड़ 60 लाख है। उसमें से केवल 25 लाख ही राजस्थान में हैं शेष हरियाणा, मध्यप्रदेश, गुजरात, राजधानी क्षेत्र, उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर व हिमाचल प्रदेश में बसे हैं। उन्हें अनुसूचित जनजाति में सम्मिलित करने का निर्णय इन सब राज्यों को भी स्वीकार करना होगा जो कार्य केन्द्र ही सब राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बुलाकर कर सकता है। फिर भी गत वर्ष के गुर्जर आंदोलन के पश्चात् राजस्थान सरकार ने उनकी मांग पर विचार करने के लिये चोपड़ा कमेटी बनायी जिसने काफी अध्ययन के पश्चात् दिसम्बर 2007 में अपनी रिपोर्ट दी। उसने काफी ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं सम्बंध प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हां, उन्हें घुमंतू जाति की श्रेणी देकर 4 से 6 प्रतिशत का अतिरिक्त आरक्षण दिया जा सकता है।
वोट राजनीति
राजस्थान सरकार ने यह रिपोर्ट और उनकी अनुशंसा केन्द्र सरकार को जनवरी, 2007 में भेज दी। किन्तु केन्द्र सरकार ने उस पर कोई कार्रवाई करना उचित नहीं समझा। वे भी गुर्जरों का इस्तेमाल आने वाले चुनावों में अपनी वोट राजनीति के लिये करना चाहते हैं इसीलिये गुर्जरों के हिंसक आंदोलन को लोकतंत्र के लिये खतरा बताने की बजाए वे उसे हवा दे रहे हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने बड़ी बेशर्मी से कहा कि यदि वसुंधरा राजे ने कोई वचन दिया था तो वे उसे पूरा क्यों नहीं करती? सोनिया पार्टी के सब पदाधिकारी इस विषय को दलीय राजनीति से बाहर रखने के बजाय गुर्जर आंदोलन के लिये राजस्थान की भाजपा सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। सोनिया पार्टी के गुर्जर नेता राजस्थान में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहे हैं और राजस्थान की सरकार को नैतिक आधार पर त्यागपत्र देने के लिये ललकार रहे हैं। वे भूल जाते हैं कि उनके शासनकाल में ही मीणा लोग धोखे से अनुसूचित जनजाति की सूची में स्थान पा गए और लम्बे समय तक उनकी कई सरकारों ने गुर्जरों की मांग को अनसुना किया। अभी भी वे यदि सत्ता में आ जाएं तो इस मांग को स्वीकार नहीं कर पाएंगे। क्योंकि अब यह प्रश्न मीणा-गुर्जर प्रतिस्पर्धा में उलझ गया है। गुर्जरों के उस सूची में आ जाने से मीणाओं का एकाधिकार समाप्त हो जाएगा और वे आरक्षण की पूरी मलाई नहीं खा पाएंगे। इसीलिये पिछले वर्ष गुर्जरों के आंदोलन के विरोध में मीणा जाति भी मैदान में उतर पड़ी। राजस्थान में राजनीतिक दलों के सामने स्थिति यह है कि गुर्जरों की मांग पूरी करने पर मीणाओं का समर्थन खोने का खतरा खड़ा हो जाता है। मीणाओं की जनसंख्या अधिक होने के कारण राजस्थान की वोट राजनीति से उनका वजन अधिक है। ओबीसी की सूची में जाटों के सम्मिलित होने से गुर्जर लोग अपने को छला हुआ समझने लगे हैं।
वास्तव में आरक्षण नीति जाति संस्था को मिटाने की बजाए उसे स्थायी करने का कारण बन गयी है। वह जातियों को जोड़ने के बजाए उनमें स्पर्धा और कटुता पैदा करती है। वह वोट राजनीति का हथियार बन गयी है। सभी दल चुनाव जीतने के लोभ में आरक्षण का झुनझुना जातियों के सामने फेंकते हैं। आरक्षण नीति ने जातियों में स्वावलंबन और स्वाभिमान का भाव जगाने के बजाए उन्हें आरक्षण की भीख पाने के लिये जातियों की पंक्ति में खुद को निम्न से निम्नतर बताने का निर्लज्ज भाव पैदा किया है। गुर्जर समाज को ही लें। यदि वह समाज आरक्षण की सुविधा के बिना भी राजेश पायलट, सचिन पायलट और कर्नल करोड़ी सिंह बैंसला जैसे लोग पैदा कर सकता है तो गुर्जर महापंचायत गुर्जरों को अपने संगठित बल के सहारे शिक्षा, नौकरियों व अन्य क्षेत्रों में कीर्तिमान स्थापित करने की प्रेरणा क्यों नहीं दे सकती? क्यों गुर्जर समाज को शिक्षित व योग्य नहीं बना सकती? क्या अनुसूचित जनजाति की सूची में सम्मिलित होने से उनका गौरव बढ़ता है? क्या मुट्ठी भर सरकारी नौकरियों के लिये सशस्त्र हिंसा का रास्ता अपनाकर वे भारतीय लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं?
किंतु सच यह है कि आरक्षण के इस भूत को दल और वोट की वर्तमान राजनीतिक प्रणाली बोतल में बंद नहीं कर सकती। उसका जातिवादी राजनीति में निहित स्वार्थ पैदा हो गया है। आरक्षण नीति के कारण देश की युवा पीढ़ी में अपनी प्रतिभा और योग्यता पर से विश्वास खत्म होता जा रहा है। वह आत्महत्या के रास्ते पर बढ़ रही है या विदेश पलायन कर रही है। प्रतिभा और योग्यता की पुनप्र्रतिष्ठा के लिये आरक्षण नीति के भूत को दफनाने का निर्णय लेना ही होगा पर यह निर्णय वर्तमान राजनीतिक प्रणाली के दायरे में नहीं लिया जा सकता। उसके लिये उससे बाहर निकलना होगा पर कैसे? यही बड़ा यक्ष प्रश्न है।
द (30 मई, 2008)  http://panchjanya.com/arch/2008/6/8/File9.htm  से साभार
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सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

गुर्जरों की तरह


एक आदमी अपने स्वार्थ के लिए कितनी जिंदगियां दांव पर लगा देता है. राजेंद्र राठौड ने दारा सिंह से अपनी दुश्मनी निकालने के लिए फर्जी मुठभेड़ के लिए कितने पुलिस वालों को यूज कर लिया. आज वे सभी जेल में पड़े हैं और उनके बीबी बच्चे परेशानियों से गुजर रहे हैं. एक आदमी की करतूत को कितने परिवार भुगत रहे हैं ? ऐसे ही कई पुलिस वाले अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद हैं, सोहराबुद्दीन केस में. इसी स्टाइल में एक मार्बल वाले को बचाने के लिए. माना कि ये पुलिस वाले भी जल्दी ही 'ऊपर' पहुंचना चाहते थे, पर कुदरती न्याय से 'अंदर' पहुँच गए !
और कमाल यह कि ऐसा व्यक्ति भाजपा की कोर समिति का सदस्य है. यही नहीं यह व्यक्ति उस वसुंधरा का खास है, जिसे भोले भाले राजस्थानी अपनी भाग्य विधाता माने बैठे हैं, केवल गहलोत से चिड के कारण. इससे बेखबर कि फिर वह शासन में आयेगी, फिर राजेंद्र, दिगंबर, भवानी सिंह जैसे व्यक्ति राज करेंगे. फिर गोपाल फोगावत, जगदीश गोदारा, सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापत जैसे लोग साजिशन या फर्जी मुठभेड़ों में मारे जायेंगे. फिर गुर्जरों की तरह किसी और कौम के लोग इनके झ

 ांसे में आकर मरेंगे. या फिर कुछ किसान घडसाना या सोयला कांड की तरह पानी की मांग करते हुए शहीद होंगे.फिर ललित मोदी जैसे लोग रामबाग होटल से राजस्थान का राज चलाएंगे, राजस्थान का पैसा लूट कर ले जायेंगे. वही मोदी जो आज आई पी एल घोटाले में रेड कोर्नर नोटिस के कारण लन्दन में छुपा बैठा है. लन्दन , जहाँ वसुंधरा ने पिछले कुछ महीने गुजारे हैं.
मुझे आज वाकई में राजस्थान के गुलामी पसंद वाशिंदों पर दया आ गई. मैं बच रहा था कि ऐसे विषयों पर लिखने से बचूं, क्योंकि लोग वसुंधरा के अंधे भक्त बन गए हैं, झूठी बातों के बार बार दोहराए जाने के कारण. विनाश की देवी को विकास की देवी बताकर. मैं सोचता था कि नक्कारखाने में मेरी तूती की आवाज कौन सुनेगा. अपने रास्ते चलने की ठान ली थी, अकेले ही. लेकिन आज रहा नहीं गया. मित्रों हकीकत यही है. हनुमान बेनीवाल और किरोड़ी लाल मीना सच ही कह रहे हैं, पर कुछ लोग उन्हें कॉंग्रेसी एजेंट बताकर उनका मजाक उड़ा रहे हैं. पर शायद, जब तक लोग असलीयत समझेंगे, बहुत देर हो चुकेगी.
तो क्या करें ? क्या तीसरा मोर्चा सही विकल्प है ? नहीं , यह कोई सही विकल्प नहीं है. मोर्चा तो पहला ही बनना चाहिए. राजस्थान के विकास को समर्पित. घटिया राजनीति या कूटनीति से दूर. जागरूक नागरिकों के दम पर. स्वाभिमानी नागरिकों के दम पर. राजस्थान को हमने सुल्तानों, मुगलों, मराठों(सिंधियाओं) और अंग्रेजों के हाथों बहुत लुटवाया और बर्बाद करवाया है. अब और नहीं. 'अभिनव राजस्थान अभियान' से जुडिये. ३० दिसम्बर को नया इतिहास लिखना है. 'अपना शासन' स्थापित करना है. गहलोत की अक्षमता और वसुंधरा के व्यवसायीकरण से दूर.
@इस विषय पर कल और लिखूंगा. अब समय नष्ट करना ठीक नहीं है, वर्ना राजस्थान के कुशासन में डूबने के बाद केवल पछतावा रह जाएगा. उसी कुशासन में जिसे लोग प्रस्तुतीकरण के भ्रम में 'सुशासन' समझ बैठे थे. गहलोत से चिड जायज है, पर उसका एकमात्र हल कुँए में कूद जाना नहीं है. और भी रास्ते हैं जिन पर बात करेंगे. बस अपना संयम कायम रखियेगा.

writer abinav rajasthan abhiyan ke founder member h

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

गुर्जरों को एसटी दर्जे पर ऐसे कन्नी काटी कांग्रेस

             

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सौ साल पहले गुर्जर चाहते थे- उन्हें क्षत्रीय माना जाए। आज कह रहे हैं- 'हमें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिले।' पर गुर्जर हैं क्या? अपन इतिहास के पन्ने पलटें। तो गुर्जरों की कई कहानियां मिलेंगी। पहली कहानी- हूण दो गुटों में बंट गए। रेड हूण और सफेद हूण। रेड हूण यूरोप चले गए। सफेद हूण ऑक्सेस घाटी पार कर काबुल में घुसे। काबुल में उनने किशन साम्राज्य पर कब्जा किया। फिर भारत में घुस आए। कहानी है- वे जॉर्जिया से आए। जो अंग्रेजी में 'जी' से शुरू होता है। जॉर्जिया का अपभ्रंश ही गुर्जर- गुज्जर हुआ। वे जॉर्जिया से मध्य एशिया, इराक, ईरान, अफगानिस्तान से खैबर दर्रा पार कर भारत में घुसे। दूसरी कहानी- गुर्जर असल में राजपूत थे। मुगलों ने भारत पर हमला किया। तो औरंगजेब से राजपूतों का एक समझौता हुआ। समझौता था- 'राजपूत युध्द में हार गए। तो उनका एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम बन जाएगा।' अब भारत में ज्यादातर गुर्जर मुस्लिम। यों हिंदू, सिख और जैनी गुर्जर भी। गुर्जर भारत-पाकिस्तान-अफगानिस्तान में मौजूद। गुर्जरों की बोलियां-गुजरी, उर्दू, हिंदी, पंजाबी, पश्तो, पहाड़ी, कश्मीरी, कुच्ची, खोजकी, गुजराती, खोवर, बाल्टी। भारत में गुर्जर सिर्फ राजस्थान में नहीं। अलबत्ता दिल्ली, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, पंजाब, हिमाचल, उत्तराखंड, राजस्थान, यूपी, एमपी, गुजरात, महाराष्ट्र में भी। पर सवाल यह- गुर्जर हैं क्या? राजपूत या पिछड़े या एसटी। छटी शताब्दी में गुर्जरों का राज कई जगह था। दादरी में दरगही सिंह गुर्जर राजा थे। जिनका शासन 133 गांवों में था। मेरठ का परिलक्षितगढ़ किला गुर्जर राजा नैन सिंह ने बनवाया। राजस्थान में भीनमाल गुर्जर साम्राज्य की राजधानी थी। जिसकी सीमाएं गुजरात तक फैली थीं। गुजरात के सौराष्ट्र में जगह है भरूच। जिसे एक चीनी इतिहासकार ने छटी शताब्दी में गुर्जरों का देश लिखा। केएम मुंशी खुद गुर्जर थे। उनने लिखा है- 'परमदास और सोलंकी गुर्जरों के राजघराने थे।' सोलंकी गुजरात में क्षत्रीय। गुर्जरों का इतना समृध्द इतिहास। फिर वे एसटी कैसे होंगे? गुर्जरों की भूल-भूलैया यहीं खत्म नहीं होती। गुर्जर हिमाचल-जम्मू कश्मीर में एसटी। पर राजस्थान-मध्यप्रदेश में ओबीसी। गुर्जरों का आजादी के पहले आंदोलन में अहम रोल था। अंग्रेजों के खिलाफ मेरठ में 1857 का आंदोलन शुरू हुआ। ब्रिटिश गजेटियर के मुताबिक अगुवाई गुर्जरों-मुस्लिम राजपूतों ने की। सो अंग्रेजों ने गुर्जरों को क्रिमिनल ट्राइब घोषित कर दिया। यों मीणाओं को भी अंग्रेजों ने क्रिमिनल ट्राइब लिखा। दोनों ने 1857 में अंग्रेजों को लूटा। इसलिए अंग्रेजों ने इन्हें क्रिमिनल ट्राइब कहा। पर गुर्जरों का शासकीय इतिहास उन्हें सिडयूल ट्राइब नहीं बताता। पर लाख टके का सवाल यह- 'गुर्जरों के मौजूदा आंदोलन का हल क्या? क्या आंदोलन का राजनीतिकरण कर हालात बिगाड़े जाएं? क्या इसे भी वोट बैंक का जरिया बना लें? जैसे लालू-मुलायम-पासवान-मायावती का इरादा।' इन चारों ने गुर्जरों को एसटी दर्जा देने की वकालत की। सोचो, राजस्थान में बीजेपी सरकार न होती। तो इन चारों का स्टेंड क्या होता? पर इन चारों में दो तो केंद्रीय मंत्री। जो अपनी सरकार का स्टेंड तो बताएं। अपन को हैरानी केंद्रीय मंत्रियों की हिंसक आंदोलन को शह पर। बैंसला ने आंदोलन की शुरूआत ही हिंसा से की। रेल पटरियां उखड़वा दीं। अब तो नेशनल हाइवे भी जाम कर दिया। तो क्या सरकारें हिंसा के आगे झुक जाएं? क्या सरकारें इतनी कमजोर हो चुकी? अगर हिंसा बात मनवाने का जरिया बन गया। तो अपना देश भुरभर्रा कर गिर जाएगा। अपन सारा पूर्वोत्तर गवां बैठेंगे। जम्मू कश्मीर गंवा बैठेंगे। अपन तो हैरान सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पर। जो वसुंधरा को धमकियां दे रही हैं। बैंसला के हिंसक आंदोलन को खुल्लम-खुल्ला समर्थन। पर गुर्जरों को एसटी दर्जा देने पर जुबान नहीं खोल रही। मनीष तिवारी सीएम वसुंधरा को तानाशाही कह रहे थे। तो अपन ने उनसे पूछा- 'कांग्रेस का स्टेंड तो बताओ?' वह बोले- 'सवाल एसटी दर्जे का नहीं। सवाल वसुंधरा सरकार की तानाशाही का।' असली सवाल से ऐसे कन्नी काटी कांग्रेस।
साभार http://indiagatenews.com से

गुर्जर आंदोलन


गुर्जर आंदोलन: अराजकता में सबकुछ खोया
से साभार
  • एहतिशाम ‌सिद्दीकी का आलेख 
गुर्जर आंदोलन: अराजकता में सबकुछ खोयाजयपुर। भारतीय सेना में कर्नल जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहकर जिस किरोड़ी सिंह बैंसला ने देश की रक्षा के लिए सीमा पर और जरूरत पड़ी तो देश के भीतर भी कानून व्यवस्था स्थापित करने में अराजक तत्वों और सरकारी एवं गैर सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई में हिस्सा लिया, उसी बैंसला की गुर्जर फौज अपने ही गृह राज्य में अपनी बात मनवाने के लिए हिंसक तरीके इस्तेमाल करके देश की जीवन रेखा रेल की पटरियां उखाड़ते हुए, रास्ते रोकते हुए, सरकारी और जनसामान्य की अरबों रुपए की संपत्तियों को आग लगाते हुए देखी गई तो उसका अनुसरण देश के दूसरे भागों में भी होने लगा है। पंजाब में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम की गिरफ्तारी की मांग को लेकर पंजाब के लोगों ने रेल पटरियों और रेल गाडि़यों को निशाना बनाया। बिहार में हिंसक माओवादी भी ऐसा ही कर रहे हैं। आंदोलनों के इन हिंसक तौर तरीकों को लेकर जन सामान्य में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। बहरहाल हिंसात्मक रूप में लंबा चले राजस्थान के गुर्जर आरक्षण आंदोलन से गुर्जरों को राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक रूप से क्या हासिल हुआ, यह अभी भी अनिश्चित और अनुत्तरित सवाल है। राजनीतिक दलों में विधानसभा या लोकसभा क्षेत्रों के नए दावेदार नेताओं की संख्या बढ़ने के अलावा गुर्जरों के हाथ में कुछ नहीं आया है। 
राजस्थान सरकार से अपने लिए विशेष आरक्षण हासिल करने के लिए यहां के गुर्जर किस तरह से कई दिन तक गंभीर अराजकता और हिंसा पर उतारू रहे, पूरे देश में और देश के बाहर भी देखा गया। राजस्थान की वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार वोटों के लालच में फंसी खड़ी दिखाई दी और गोली चलवाकर भी इस आंदोलन निपटने में विफल साबित हुई है। इस संघर्ष में तीन दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए हैं। किरोड़ी सिंह बैंसला अड़े हुए थे कि चाहे जो हो, जब तक उन्हें आरक्षण में मीणाओं जैसा विशेष दर्जा नहीं मिलता वह अपना आंदोलन जारी रखेंगे। गुर्जर आंदोलन में राजस्थान सरकार यह कथन सही साबित हुआ कि इस आंदोलन में डकैत और अराजक तत्व जनसामान्य को ढाल बनाकर अराजकता और हिंसा फैलाते हुए सुरक्षा बलों पर हमले करते रहे। जाना-माना जगन गुर्जर डकैत कर्नल बैंसला के साथ खड़ा, मीडिया के कैमरों की नजरों से अपने को छिपाने का असफल प्रयास करता देखा गया। जगन गुर्जर ने तो खुलेआम वसुंधरा राजे सिंधिया के धौलपुर के पुश्तैनी घर तक को बम से उड़ाने की धमकी दे डाली। मजे की बात यह भी रही कि आर्ट आफ लीविंग के सूत्रधार आध्यात्मिक गुरू रविशंकर जैसों ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया जिसकी लेकर जन सामान्य में तीखी प्रतिक्रिया हुई।  
राजस्थान इस अकारथ आंदोलन के कारण पिछले छह महीनों से रेगिस्तान की गर्म रेत की तरह धधकता रहा है। चुनावी जमीन तैयार करने के लिए इस आंदोलन की आड़ में सबकुछ हुआ। राजस्थान सरकार ने गुर्जरों की मांग पर एक आयोग का गठन किया था जिसकी रिपोर्ट आने के बाद वसुंधरा सरकार ने केंद्र सरकार को गुर्जरों को आरक्षण देने के लिए पत्र लिखा था। राजस्थान सरकार ने गुर्जरों को आश्वासन दिया था। लेकिन गुर्जरों ने समझा कि वसुंधरा सरकार धोखा दे रही है इसलिए वह फिर से आंदोलन पर उतर आए और उनका आंदोलन हिंसात्मक हो गया। लोकसभा चुनाव सर पर हैं इसलिए कोई भी राजनीतिक दल राजस्थान की इस आग में कूदने की हिम्मत नहीं जुटा सका, क्योंकि इसमें सबको अपने वोटों की चिंता थी। भारतीय जनता पार्टी इस संघर्ष में फंसी हुई है जिससे अब तय है कि उसे राजस्थान में अगर एक का वोट पाना है तो दूसरे समुदाय का वोट गंवाना है। बाकी राजनीतिक  दल मीणा और गुर्जर समुदाय के बारे में खुलकर कोई भी बात कहने से डर रहे हैं। 
इस आंदोलन से भारत की जीवन रेखा भारतीय रेल को भारी नुकसान हुआ और राजस्थान का पर्यटन तबाह हो गया। भरतपुर में लोग लोहे के बड़े-बड़े सभ्भल लेकर ऐसे रेल की पटरियां उखाड़ रहे थे जैसे उस जगह पर अब कभी रेल चलनी ही नहीं है। मीडिया के कुछ कैमरामैन भी वहां उन्हें अपने ब्रेकिंग शॉट के लिए गुर्जरों को हिंसा के लिए उकसाते देखे गए ताकि यह आंदोलन और उग्र तरीके से उनके टीवी चैनल पर देश दुनिया को दिखाया जा सके। मीडिया के कुछ अति उत्साही और तथा कथित विशेषज्ञ विश्लेषणकर्ताओं का रोल इस आंदोलन के बारे में केवल तथ्यहीन और अपने भड़काऊ विचार प्रकट करना, खबरों को ब्रेकिंग न्यूज के रूप में पेश करना भर दिखाई दिया। मानो उनका सामाजिक जिम्मेदारियों से कोई सरोकार नहीं है। वे चैनलों पर बैठकर आग लगाते रहे और फोर्स उग्र लोगों और अराजकता से निपटती रही। इस आंदोलन में जो लोग मौत के मुंह में चले गए, अब कोई चैनल या नेता उनके परिवारों का हाल जानने या उनकी मदद को नहीं जा रहा है। इसमें राजस्थान के नागरिक सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के नेताओं का जैसे कोई भी मतलब और कोई भी जिम्मेदारी नहीं है। उस वक्त अपने चश्मे से देखने और बयानबाजी करने के लिए यहां झुंड के झुंड खड़े दिखाई दिए हैं। 
देश के गुर्जर समाज का उसकी देशभक्ति और वीरता का एक इतिहास है। राजस्थान से लगी भारत की सीमाओं पर गुर्जर समाज के लोग रहते हैं और उनके परिवारीजन आए दिन विदेशी हमलावरों और अराजक तत्वों का भी मुकाबला करते हैं। राजस्थान में जिस कौम के नाम वीरता और देश के लिए मर मिटने के हजारों किस्से और बलिदान दर्ज हैं वह अपनी मांग के लिए अपने ही देश में एक ऐसी हिंसा जनित कार्रवाई को अंजाम दें जिससे देश में सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हो तो उसे उचित नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में गुर्जरों से संयम बरतते हुए राजनैतिक रूप से अपनी समस्या के समाधान के तरीके अपनाने जाने चाहिए थे। यह दुखद स्थिति बन रही है कि जो गुर्जर सीमाओं पर और सेना में रहकर देशद्रोहियों से मोर्चा लेते रहे हैं उन्होंने आज अपने ही देश में अपनों से ही मोर्चा खोल दिया है।
महारानी की विफलताएं 
राजस्थानमहारानी की विफलताएं की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया गुर्जर आंदोलन और इस तरह की जन समस्याओं से निपटने में पूरी तरह से विफल साबित हुई हैं। अपने साढ़े चार साल के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में वसुंधरा राजे ने राजस्थान को क्या दिया है इस प्रश्न का उनके पास कोई माकूल जवाब नहीं है। अगर साफ-साफ कहा जाए तो राजस्थान में ‘कमल’ को इसकी कीमत चुकानी पड़ी है। अगर महारानी अपने महल से बाहर निकलतीं और आम लोगों के बीच रहतीं तो राजस्थान में ऐसे जातीय आंदोलन खड़े नहीं होते और भारतीय जनता पार्टी का कमल संकट में न होता। ‘महारानी’ तो अपनी जुल्फों के गजरें खिलाती रहीं लेकिन उस कमल को रौंद दिया जिसके कारण उन्हें राजस्थान का ताज मिला। ऐसे ही कई कारणों से आज राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी में भी ‘महारानी’ के खिलाफ विरोध के स्वर उठ रहे हैं। 
भाजपा में पूछा जा रहा है कि आखिर वसुंधरा राजे सिंधिया ने ‘कमल’ के लिए क्या किया? कितने वोट जोड़े? राजस्थान के गुर्जर तो भाजपा से उड़ा दिए? गुर्जर आंदोलन खड़ा कैसे हुआ? जब इसकी शुरूआत हुई थी तब ‘महारानी’ क्या कर रही थीं? इतने सारे लोग मरने के बाद अब क्या मतलब रहा है? कहने वाले कहते हैं कि ‘महारानी’ को इस बात से और राजस्थान की जनता से न तो कभी मतलब था और न आज मतलब है। उन्हें यह ताज भी राजघरानों के दरबारी रहे अटल बिहारी वाजपेयी के कारण हासिल हुआ था। वसुंधरा राजे सिंधिया देवी-देवताओं की तरह से अपनी पूजा करवाने और मॉडलिंग के अलावा करती भी क्या रहीं? उनका भाजपा के आम कार्यकर्ताओं से ज्यादा वास्ता ही नहीं रहा। वह तो उनसे मिलती भी नहीं है। भाजपा कार्यकर्ता कहा करते हैं कि इनके यहां कांग्रेस के नेताओं का कोई काम नहीं रुकता है जबकि भारतीय जनता पार्टी के नेता और कार्यकर्ता राजस्थान में भटकते फिर रहे हैं, फर्जी मुकदमों में जेल जा रहे हैं, और भारतीय जनता पार्टी के अभिशाप के कारण दूसरों की नजर में सांप्रदायिक तत्व कहलाए जा रहे हैं। 
राजस्थान में ऐसे बीजेपी कैसे बचेगी यह ज्वलंत सवाल ‘महारानी’ से पूछने की किसी भाजपाई नेता की हिम्मत नहीं है। हां, कार्यकर्ता जरूर यह सवाल पूछ रहा है और कह रहा है कि भाजपाई वसुंधरा राजे से काम लेने के लिए किसी कांग्रेसी नेता की सिफारिश ज्यादा कारगर है। इनकी सरकार के मंत्री भी किसी भाजपाई की मदद नहीं कर पाते हैं, क्योंकि उन्हें वसुंधरा की तरफ से कोई छूट नहीं है। राजस्थान का हर आदमी जानता है कि ‘महारानी’ से मिलना कोई आसान काम नहीं है। फोन पर बात करना तो बहुत दूर की बात है। वसुंधरा राजे आज तक राजघरानों की परंपराओं से बाहर नहीं निकल सकीं हैं, इसीलिए आज भारतीय जनता पार्टी को राजस्थान में नुकसान हो रहा है। भाजपा के राजस्थान ही नहीं बल्कि दिल्ली के नेता भी कहते आए हैं कि यदि वसुंधरा की जगह पर कोई और मुख्यमंत्री होता तो राजस्थान में भाजपा का इतना बुरा हाल नहीं होता। इसीलिए राजस्थान में भाजपा की फिर से वापसी पर प्रश्न खड़े हुए हैं। राजस्थान में एहसास ही नहीं होता कि यहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। ‘महारानी’ के महल में भी प्रमुख कांग्रेसी नेताओं का बेरोक टोक आना जाना है। भाजपा के कलराज मिश्र जैसे कागजी नेताओं को इसीलिए राजस्थान का प्रभारी बनाया गया ताकि वह वसुंधरा के सामने कोई बकवास न कर सकें। इसीलिए पूर्व विदेश मंत्री और भाजपा नेता जसवंत सिंह और उनकी पत्नी ने महारानी के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है जो इस बात का संकेत है कि वसुंधरा राजे सिंधिया राजस्थान में भाजपा का बंटाधार कर रही हैं।