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गुरुवार, 14 नवंबर 2013

garvile gurjar

about gurjar - Rahul Khari

Gurjar or Gujjar or Gujar or Goojar are basically a single word and they were used and still have been used depending on the comfort of the speaker. They do not have any difference just pronounced differently. The origin of these different forms of Gurjar community goes back to the history of Kushanas. Kanishka used the term Gusur in his inscriptions. Cunningham also identified Kushans as Gurjars (or Gujjars). Word Gusur is referred in Rabatak inscription of Kushan king Kanishka.According to some scholars the Word Gusur, which means Kulputra or man or woman born in high family, in this inscription stands for Gujar or Gurjaras.Gurjars of Central Asia are termed as Gusur (Gujur) even today.
Alberuni during his visit to India too mentioned Al-Juzr or Al-Jurz, which means Gurjars, as a very powerful king of India.
Another mention about the Gurjar community can be found in the writings of Hiuen Tsang where he also mentioned that the king Kiu-che-lo (Gurjar) rules in the North West and North East of India who is a very powerful king.
The time when for the first time the complete term Gurjar Pratihar was used in Indian subcontinent, in the same century, the Khazars came in power between the Black Sea and the Caspian Sea. From their they also expanded and there is possibility that Khazars could have tried to enter into India from the present day Pakistan. Khazar and Gurjar resembles a lot. So, there is another possibility of the origin of the word Gurjar from Khazars.
  • Rahul Khari
    Profession: Assistant Professor (Portuguese, Department of Germanic and Romance Studies, University of Delhi)
    (Author: Origin,History and Culture of Jats and Gujars, Reference Press,2007)

Munawwar Hasan

Munawwar Hasan (May 15, 1964 – December 10, 2008) was an Indian politician for the Muzaffarnagar constituency in Uttar Pradesh. He was killed in a road accident near Palwal in Haryana. The accident occurred at about 1.15 am when Hasan was travelling from Mathura to Delhi in a Scorpio vehicle, which collided with a truck coming from the opposite direction near Banchari village on National Highway 2. Forty four-year-old Hasan was brought dead to the Apollo Hospital at 3 am. The lawmaker, who was elected on a Samajwadi Party ticket from Muzaffarnagar in Uttar Pradesh in 2004, had defected to the Bahujan Samaj Party at the time of July 22 trust vote. He was expelled by the Samajwadi Party, which also filed a petition seeking his disqualification from the House. The petition is pending with the Lok Sabha Speaker. He was also elected to the Lok Sabha in 1996 on an SP ticket.
  • chaudhary manawar hasan was a good man he was gentle every time to help the public he was a restless man for his supporters day night hard worker he got world reccord for his politics as he got four assemly in a little age.
  • they blong to muslim gurjar community.
Position Held
  • Member, Committee on Railways
  • Member, House Committee
  • Member, Committee on Transport and Tourism
1996 Elected to 11th Lok Sabha
  • Member, Committee on Agriculture
1991-1996 Member, Uttar Pradesh Legislative Assembly (two terms)
  • Member, Cosultative Committee, Ministry of Tourism
1998-2003 Member, Rajya Sabha
December 2003-2004 Member, Uttar Pradesh Legislative Council
2004 Re-elected to 14th Lok Sabha (2nd term)
  • Member, Committee on Labour
  • Member, Committee on Members of Parliament Local Area Development Scheme
5 Aug. 2007 onwards Member, Standing Committee on Labour
in hindi sadik choudhary and tranlate by manmohan kasana

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

ये भी हमारी बेटी है


Rukhsana Kausar

Born
1989
Residence
Thana Mandi, Upper Kalsi, Shahdhara Shareif,
Rajouri district, J&K
Nationality
Indian
Ethnicity
Gujjar
Citizenship
Indian
Education
10th-grade dropout
Known for
Killed a LeT terrorist and injured another at her residence in Rajouri district.
Home town
Rajouri
Religion
Islam
Spouse(s)
Kaber Husain
Parents
Noor Hussain (Father),
Rashida Begum (Mother)
Relatives
Aijaz (Brother),
Waqalat Hussain (Uncle),
Kulzum Pari (Aunt)
Awards
Announced National Bravery Award,
Cash award of Rs 5,000 by J&K government,
Cash award of Rs 1 lakh by All India Anti-Terrorist Front (AIATF) Chairman M S Bitta.



राजेश पायलट




गुरुवार, 8 नवंबर 2012

डा. सुशील भाटी


          एम.ए.,पी.एच.डी.(इतिहास)
               नेट+जे.आर.एफ.(इतिहास)
प्रवक्ता, इतिहास विभाग,
राजकीय महाविद्यालय लक्सर,
हरिद्वार(उत्तराखंड)
अध्यक्ष
जनइतिहास समिति, मेरठ
(आम जन के इतिहास पर शोध करने वाली संस्था)
mob- 09411445677
संपादक
जनइतिहास
(जनइतिहास समिति द्वारा प्रकाशित शोध पत्रिका)
कार्य-
1. 20 से अधिक शोध पत्र राष्ट्रीय एवं अंतरास्ट्रीय शोध पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में प्रकाशित,
2. 1857 की क्रांति के गुमनाम शहीदों और शहीद ग्रामो पर विशेष शोध कार्य
3. शहीद धन सिंह कोतवाल पर किये शोध कार्य को विशेष पहचान मिली
4. गुर्जर आरक्षण आन्दोलन में चोपड़ा समिति के समक्ष कर्नल किरोडी सिंह बैंसला के नेतृत्व वाली राजस्थान गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के लिए मुख्य प्रतिवेदन लिखा जिसमे बताया गया था कि राजस्थान के गुर्जर किस प्रकार जनजातीय मानदंडो को पूरा करते हैं| इस मामले कि मुख्य सुनवाई पर कर्नल बैसला के साथ चोपड़ा समिति के समक्ष उपस्थित होकर गुर्जरों का पक्ष रखा|
5. गुर्जरों सहित उत्तर प्रदेश के 19 विमुक्त जातियों के विमुक्त जाति के दर्जे बहाली के लिए शोध कार्य किया और सन 2007 में विमुक्त जाति आयोग (रेनके आयोग) और उत्तर प्रदेश सर्कार को इस कार्य के लिए प्रतिवेदन सौपा|यह शोध कार्य – “अपराधी होने का कलंक अंतरास्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हैं|
6. समाज में इतिहास चेतना उत्पन्न करने हेतु सम्राट कनिष्क कुषाण/कसाना और सम्राट मिहिरकुल हूण पर विशेष शोध कार्य किया और इनकी जयंती मनाने की अखिल भारतीय पहल की |
 सम्मान-हस्तिनापुर शोध संस्थान, मेरठ द्वारा चौधरी रघुवीर नारायण त्यागी लोनी मार्च सम्मान एवं अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित|



शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

विट्ठलदास झवेरभाई पटेल


विट्ठलदास झवेरभाई पटेल (जन्म- 27 सितम्बर, 1873 ई.; मृत्यु- 1933 ई.) भारत के प्रमुख राष्ट्रीय नेता और सरदार वल्लभ भाई पटेल के बड़े भाई थे। अपनी बैरिस्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही ये देश को आज़ादी दिलाने के कार्य में जुट गये। ब्रिटिश सरकार द्वारा जेल में नज़रबन्द कर दिये जाने के दौरान ही इनक स्वास्थ्य चौपट हो गया और 1933 ई. में वियना में इनकी मृत्यु हो गई।

परिचय

झवेरभाई पटेल का जन्म 27 सितम्बर, 1873 ई. को नड़ियाद, गुजरात में हुआ था। 1905 ई. में इन्होंने अपनी बैरिस्टरी पूरी की और वक़ालत करने लगे, परन्तु शीघ्र ही भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में खिच आये। इन्होंने रौलट एक्ट के विरुद्ध भारत में प्रबल जन आंदोलन चलाया। इन्हें केन्द्रीय असेम्बली का सदस्य भी चुना गया, किन्तु कांग्रेस की असहयोग की नीति के अनुसार सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। बाद में ये स्वराज्य पार्टी में सम्मिलित हो गये और केन्द्रीय असेम्बली के पहले ग़ैर सरकारी अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे।

जेल में नज़रबन्द

इन्होंने अपना निर्णायक मत डालकर सरकारी सार्वजनिक सुरक्षा बिल को अस्वीकृत करा दिया और अधिवेशन के दौरान पुलिस को केन्द्रीय असेम्बली हॉल में प्रवेश करने से रोक दिया। इन्होंने 1930 ई. में कांग्रेस नेताओं के नज़रबंद कर दिये जाने के विरोधस्वरूप केन्द्रीय असेम्बली के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया और इसके बाद ही स्वयं इनको भी नज़रबंद कर दिया गया। जेल में उनका स्वास्थ्य चौपट हो गया और वे स्वास्थ्य सुधार के लिए यूरोपचले गए।

निधन

वियना में उनकी भेंट नेताजी सुभाषचन्द्र बोस से हुई। नेताजी पर उनका पूरा विश्वास था और उन्होंने उनको अपनी इच्छानुसार राष्ट्रीय कार्यों में ख़र्च करने के लिए दो लाख रुपये की वसीयत कर दी। इसके बाद ही वियना में उनकी मृत्यु हो गई। 1933 ई. में उनकी मृत्यु पर छोटे भाई सरदार पटेल ने असहयोग के सिद्धान्तों में विश्वास करते हुए भी भारत में ब्रिटिश अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया और बड़े भाई की वसीयत रद्द करा दी। विट्ठलदास झवेरभाई पटेल महान देशभक्त थे और भारत के अंग्रेज़ शासक भी उसने डरते थे।

सरदार वल्लभ भाई पटेल


सरदार वल्लभ भाई पटेल (31 अक्तूबर, 1875 - 15 दिसंबर, 1950) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम गृह मंत्री थे। उनका जन्म नडियाद, गुजरात मे हुआ था। भारत की स्वतंत्रता संग्राम मे उनका मह्त्वपूर्ण योगदान है। भारत की आजादी के बाद वे प्रथम गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री बने। उन्हे भारत का लौह पुरूष भी कहा जाता है। बल्लभभाई पटेल का जन्म एक कृषक परिवार में हुआ था। वे झवेरभाई पटेल एवं लदबा() की चौथी संतान थे। सोमभाई, नरसीभाई और विट्टलभाई उनके अग्रज थे। उनकी शिक्षा मुख्यतः स्वाध्याय से ही हुई। लन्दन जाकर उन्होने बैरिस्टर की पढाई पूरी की और वापस आकर गुजरात के अहमदाबाद में वकालत करने लगे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया। स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बडा योगदान खेडा संघर्ष में हुआ। गुजरात का खेडा खण्ड(डिविजन) उन दिनोम भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से भारी कर में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो सरदार पटेल, गांधीजी एवं अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हे कर न देने के लिये प्रेरित किया। अन्त में सरकार झुकी औअर उस वर्ष करों में राहत दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हे पहले बारडोली का सरदार औअर बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा। सरदार पटेल १९२० के दशक में गांधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन के समय कांग्रेस्स में भर्ती हुए। १९३७ तक उन्हे दो बार कांग्रेस के सभापति बनने का गौरव प्राप्त हुआ। वे पार्टी के अन्दर और जनता में बहुत लोकप्रिय थे। कांग्रेस के अन्दर उन्हे जवाहरलाल नेहरू का प्रतिद्वन्दी माना जाता था।
यद्यपि अधिकांश प्रान्तीय कांग्रेस समितियाँ पटेल के पक्ष में थीं, गांधी जी की इच्छा का आदर करते हुए पटेल जी ने प्रधानमंत्री पद की दौड से अपने को दूर रखा और इसके लिये नेहरू का समर्थन किया। उन्हे उपप्रधान मंत्री एवं गृह मंत्री का कार्य सौंपा गया। किन्तु इसके बाद भी नेहरू और पटेल के सम्बन्ध तनावपूर्ण ही रहे। इसके चलते कई अवसरों पर दोनो ने ही अपने पद का त्याग करने की धमकी दे दी थी। गृह मंत्री के रूप में उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों(राज्यों) को भारत में मिलाना था। इसको उन्होने बिना कोई खून बहाये सम्पादित कर दिखाया। केवल हैदराबाद के आपरेशन पोलो के लिये उनको सेना भेजनी पडी। भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हे भारत का लौह पुरूष के रूप में जाना जाता है। सन १९५० में उनका देहान्त हो गया। इसके बाद नेहरू का कांग्रेस के अन्दर बहुत कम विरोध शेष रहा।
सरदार पटेल ने आजादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही पीवी मेनन के साथ मिलकर कई देसी राज्यों को भारत में मिलाने के लिये कार्य आरम्भ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देसी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हे स्वायत्तता देना सम्भव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप तीन को छोडकर शेष सभी राजवाडों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। केवल जम्मू एवं काश्मीर, जूनागढ तथा हैदराबाद के राजाओं ने ऐसा करना नहीं स्वीकारा। जूनागढ के नवाब के विरुद्ध जब बहुत विरोध हुआ तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और जूनागढ भी भारत में मिल गया। जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया। किन्तु नेहरू ने काश्मीर को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह समस्या एक अन्तराष्ट्रीय समस्या है।