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रविवार, 23 दिसंबर 2012

चह्वान (चतुर्भुज) चौहान



अग्निवंश के सम्मेलन कर्ता ऋषि
१.वत्सम ऋषि,२.भार्गव ऋषि,३.अत्रि ऋषि,४.विश्वामित्र,५.चमन ऋषि
विभिन्न ऋषियों ने प्रकट होकर अग्नि में आहुति दी तो विभिन्न चार वंशों की उत्पत्ति हुयी जो इस इस प्रकार से है-
१.पाराशर ऋषि ने प्रकट होकर आहुति दी तो परिहार की उत्पत्ति हुयी (पाराशर गोत्र) २.वशिष्ठ ऋषि की आहुति से परमार की उत्पत्ति हुयी (वशिष्ठ गोत्र) ३.भारद्वाज ऋषि ने आहुति दी तो सोलंकी की उत्पत्ति हुयी (भारद्वाज गोत्र) ४.वत्स ऋषि ने आहुति दी तो चतुर्भुज चौहान की उत्पत्ति हुयी (वत्स गोत्र)
चौहानों की उत्पत्ति आबू शिखर मे हुयी दोहा- चौहान को वंश उजागर है,जिन जन्म लियो धरि के भुज चारी, बौद्ध मतों को विनास कियो और विप्रन को दिये वेद सुचारी॥
चौहान की कई पीढियों के बाद अजय पाल जी महाराज पैदा हुये जिन्होने आबू पर्वत छोड कर अजमेर शहर बसाया अजमेर मे पृथ्वी तल से १५ मील ऊंचा तारागढ किला बनाया जिसकी वर्तमान में १० मील ऊंचाई है,महाराज अजयपाल जी चक्रवर्ती सम्राट हुये. इसी में कई वंश बाद माणिकदेवजू हुये,जिन्होने सांभर झील बनवाई थी। सांभर बिन अलोना खाय,माटी बिके यह भेद कहाय" इनकी बहुत पीढियों के बाद माणिकदेवजू उर्फ़ लाखनदेवजू हुये इनके चौबीस पुत्र हुये और इन्ही नामो से २४ शाखायें चलीं चौबीस शाखायें इस प्रकार से है-
१. मुहुकर्ण जी उजपारिया या उजपालिया चौहान पृथ्वीराज का वंश २.लालशाह उर्फ़ लालसिंह मदरेचा चौहान जो मद्रास में बसे हैं ३. हरि सिंह जी धधेडा चौहान बुन्देलखंड और सिद्धगढ में बसे है ४. सारदूलजी सोनगरा चौहान जालोर झन्डी ईसानगर मे बसे है ५. भगतराजजी निर्वाण चौहान खंडेला से बिखराव ६. अष्टपाल जी हाडा चौहान कोटा बूंदी गद्दी सरकार से सम्मानित २१ तोपों की सलामी ७.चन्द्रपाल जी भदौरिया चौहान चन्द्रवार भदौरा गांव नौगांव जिला आगरा ८.चौहिल जी चौहिल चौहान नाडौल मारवाड बिखराव हो गया ९. शूरसेन जी देवडा चौहान सिरोही (सम्मानित) १०.सामन्त जी साचौरा चौहान सन्चौर का राज्य टूट गया ११.मौहिल जी मौहिल चौहान मोहिल गढ का राज्य टूट गया १२.खेवराज जी उर्फ़ अंड जी वालेगा चौहान पटल गढ का राज्य टूट गया बिखराव १३. पोहपसेन जी पवैया चौहान पवैया गढ गुजरात १४. मानपाल जी मोरी चौहान चान्दौर गढ की गद्दी १५. राजकुमारजी राजकुमार चौहान बालोरघाट जिला सुल्तानपुर में १६.जसराजजी जैनवार चौहान पटना बिहार गद्दी टूट गयी १७.सहसमल जी वालेसा चौहान मारवाड गद्दी १८.बच्छराजजी बच्छगोत्री चौहान अवध में गद्दी टूटगयी. १९.चन्द्रराजजी चन्द्राणा चौहान अब यह कुल खत्म हो गया है २०. खनगराजजी कायमखानी चौहान झुन्झुनू मे है लेकिन गद्दी टूट गयी है,मुसलमान बन गये है २१. हर्राजजी जावला चौहान जोहरगढ की गद्दी थे लेकिन टूट गयी. २२.धुजपाल जी गोखा चौहान गढददरेश मे जाकर रहे. २३.किल्लनजी किशाना चौहान किशाना गोत्र के गूजर हुये जो बांदनवाडा अजमेर मे है २४.कनकपाल जी कटैया चौहान सिद्धगढ मे गद्दी (पंजाब)
उपरोक्त प्रशाखाओं में अब करीब १२५ हैं
बाद में आनादेवजू पैदा हुये आनादेवजू के सूरसेन जी और दत्तकदेवजू पैदा हुये सूरसेन जी के ढोडेदेवजी हुये जो ढूढाड प्रान्त में था,यह नरमांस भक्षी भी थे. ढोडेदेवजी के चौरंगी-—सोमेश्वरजी--—कान्हदेवजी हुये
सोम्श्वरजी को चन्द्रवंश में उत्पन्न अनंगपाल की पुत्री कमला ब्याही गयीं थीं
सोमेश्वरजी के पृथ्वीराजजी हुये पृथ्वीराजजी के- रेनसी कुमार जो कन्नौज की लडाई मे मारे गये अक्षयकुमारजी जो महमूदगजनवी के साथ लडाई मे मारे गये बलभद्र जी गजनी की लडाई में मारे गये इन्द्रसी कुमार जो चन्गेज खां की लडाई में मारे गये
पृथ्वीराज ने अपने चाचा कान्हादेवजी का लडका गोद लिया जिसका नाम राव हम्मीरदेवजू था हम्मीरदेवजू के-दो पुत्र हुये रावरतन जी और खानवालेसी जी रावरतन सिंह जी ने नौ विवाह किये थे और जिनके अठारह संताने थीं, सत्रह पुत्र मारे गये एक पुत्र चन्द्रसेनजी रहे चार पुत्र बांदियों के रहे
खानवालेसी जी हुये जो नेपाल चले गये और सिसौदिया चौहान कहलाये.
रावरतन देवजी के पुत्र संकट देवजी हुये संकटदेव जी के छ: पुत्र हुये १. धिराज जू जो रिजोर एटा में जाकर बसे इन्हे राजा रामपुर की लडकी ब्याही गयी थी २. रणसुम्मेरदेवजी जो इटावा खास में जाकर बसे और बाद में प्रतापनेर में बसे ३. प्रतापरुद्रजी जो मैनपुरी में बसे ४. चन्द्रसेन जी जो चकरनकर में जाकर बसे ५. चन्द्रशेव जी जो चन्द्रकोणा आसाम में जाकर बसे इनकी आगे की संतति में सबल सिंह चौहान हुये जिन्होने महाभारत पुराण की टीका लिखी.
मैनपुरी में बसे राजा प्रतापरुद्रजी के दो पुत्र हुये १.राजा विरसिंह जू देव जो मैनपुरी में बसे २. धारक देवजू जो पतारा क्षेत्र मे जाकर बसे
मैनपुरी के राजा विरसिंह जू देव के चार पुत्र हुये १. महाराजा धीरशाह जी इनसे मैनपुरी के आसपास के गांव बसे २.राव गणेशजी जो एटा में गंज डुडवारा में जाकर बसे इनके २७ गांव पटियाली आदि हैं ३. कुंअर अशोकमल जी के गांव उझैया अशोकपुर फ़कीरपुर आदि हैं ४.पूर्णमल जी जिनके सौरिख सकरावा जसमेडी आदि गांव हैं
महाराजा धीरशाह जी के तीन पुत्र हुये १. भाव सिंह जी जो मैनपुरी में बसे २. भारतीचन्द जी जिनके नोनेर कांकन सकरा उमरैन दौलतपुर आदि गांव बसे २. खानदेवजू जिनके सतनी नगलाजुला पंचवटी के गांव हैं
खानदेव जी के भाव सिंह जी हुये भावसिंह जी के देवराज जी हुये देवराज जी के धर्मांगद जी हुये धर्मांगद जी के तीन पुत्र हुये १. जगतमल जी जो मैनपुरी मे बसे २. कीरत सिंह जी जिनकी संतति किशनी के आसपास है ३. पहाड सिंह जी जो सिमरई सहारा औरन्ध आदि गावों के आसपास हैं. आज कल शूद्र लोग भी अपना उपनाम चौहान लिख रहे है. [जो गलत है.]
1. ↑ Dasharatha Sharma (1975). Early Chauhān dynasties: a study of Chauhān political history, Chauhān political institutions, and life in the Chauhān dominions, from 800 to 1316 A.D.. Motilal Banarsidass. प॰ 280. ISBN 0842606181, ISBN 9780842606189. "According to a number of scholars, the agnikula clas were originally Gurjaras."
2. ↑ Royal Asiatic Society of Great Britain and Ireland (1834). Journal of the Royal Asiatic Society of Great Britain and Ireland, Volume 1999. Royal Asiatic Society of Great Britain & Ireland.. प॰ 651. "By that marriage Haarsha had contracted an alliance with the dominant race of the Gurjaras, of whom the chohans were a prominent clan."

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

दी लीजेंड ऑफ झंडा



  Sushil Bhati

ब्रिटिशराज के दौरान भारत में बहुत से लोगो ने अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों और शोषण के खिलाफ संघर्ष किया और अपने प्राणों तक की आहुति दे दी| इनमे से बहुत से बलिदानियो को तो इतिहास में जगह मिल गयी परन्तु कुछ के तो हम नाम भी नहीं जानते| ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध आम आदमी की लड़ाई लड़ने वाले कुछ ऐसे भी बलिदानी हैं जिन्हें भले ही इतिहास की पुस्तकों में स्थान नहीं मिला परन्तु ये जन आख्यानों और लोक गीतों के नायक बन लोगो के दिलो पर राज करते हैं| ऐसा ही एक क्रांतिकारी और बलिदानी का नाम हैं- झंडा गूजर| मेरठ जिले के बूबकपुर गांव के रहने वाले झंडा की ब्रिटिशराज और साहूकार विरोधी हथियारबंद मुहिम लगभग सौ साल तक लोक गीतों की विषय वस्तु बनी रही| आम आदमी की भाषा में इन लोक गीतों को झंडा की चौक-चांदनी कहते थे, यह अब लुप्तप्राय हैं| अब इसके कुछ अंश ही उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग इस लेख में कई जगह किया गया हैं| झंडा की लोकप्रियता का आलम यह था कि 1970 के दशक तक ग्रामीण इलाके में जूनियर हाई स्कूल तक के बच्चे झंडा की चौक-चांदनी घर-घर जाकर सुनाते थे और अपने अध्यापको की सहायतार्थ अनाज आदि प्राप्त करते थे| झंडा की चौक-चांदनी की शुरुआत इस प्रकार हैं-

गंग नहर के बायीं ओर बूबकपुर स्थान
जहाँ का झंडा गूजर हुआ सरनाम
झंडा का में करू बयान
सुन लीजो तुम धर के ध्यान.........

लगभग सन 1880 की बात हैं मेरठ के इलाके में झंडा नाम का एक मशहूर बागी था| उस समय अंग्रेजो का राज था और देहातो में साहूकारो ने लूट मचा रखी थी| अंग्रेजो ने किसानो पर भारी कर लगा रखे थे, जिन्हें अदा करने के लिए किसान अक्सर साहूकारो से भारी ब्याज पर कर्ज उठाने को मजबूर था| साहूकारो को अंग्रेजी पुलिस थानों, तहसीलो, और अदालतों का संरक्षण प्राप्त था, जिनके दम पर साहूकार आम आदमी और किसानो को भरपूर शोषण कर रहे थे|

झंडा की बगावत की कहानी भी ऐसी ही साहूकार के शोषण के खिलाफ शुरू होती हैं| झंडा मेरठ जिले की सरधना तहसील के बूबकपुर गांव का रहनेवाला था, यह गांव गंग नहर के बायीं तरफ हैं| वह अंग्रेजो की फौज में सिपाही था| उसके भाई ने पास के गांव दबथुवा के साहूकारो से क़र्ज़ ल रखा था| झंडा ने अपनी तनख्वाह से बहुत-सा धन चुकता कर दिया, परन्तु साहुकारी हिसाब बढ़ता ही गया| एक दिन साहूकार झंडा के घर आ धमका और उसने जमीन नीलम करने की धमकी देते हुए झंडा की भाभी से बतमीज़ी से बात की| झंडा उस समय घर पर ही था, पर वह अपमान का घूंट पीकर रह गया| लेकिन यह घटना उसके मन को कचोटती रही और वह विद्रोह की आग में जलने लगा|

कुछ ही दिन बाद गांव के पश्चिम में नहर के किनारे एक अंग्रेज शिकार खेलने के लिए आया, उसका निशाना बार- बार चूक रहा था| झंडा हँस कर कहने लगा कि “मैं एक गोली में ही शिकार को गिरा दूँगा”| अंग्रेज उसकी बातो में आ गया और उसने चुनोती भरे लहजे में बंदूक झंडा को थमा दी| झंडा ने एक ही गोली से शिकार को ढेर कर दिया और बंदूक अंग्रेज पर तान दी और उसे धमका कर बंदूक और घोडा दोनों लेकर चला गया|

उसके बाद झंडा ने अपना गुट बना लिया| कहते हैं की उसने अंग्रेजी शासन-सत्ता को चुनौती देकर दबथुवा के साहूकारों के घर धावा मारा| उसने पोस्टर चिपकवा कर अपने आने का समय और तारीख बताई और तयशुदा दिन वह साहूकार के घर पर चढ आया| भारी-भरकम अंग्रेजी पुलिस बल को हरा कर उसने साहूकार के धन-माल को ज़ब्त कर लिया और बही खातों में आग लगा दी| साहूकार की बेटी ने कहा की सामान में उसके भी जेवर हैं, तो झंडा ने कहा कि “बहन जो तेरे हैं ईमानदारी से उठा ले”|

झंडा ने आम आदमी और किसानो को राहत पहुचानें के लिए साहूकारों के खिलाफ एक मुहिम छेड दी| अंग्रेजी साम्राज्य और साहूकारों के शोषण के विरोध में हर धर्म और जाति के लोग उसके गुट में शामिल होते गए जिसने एक छोटी सी फौज का रूप ले लिया| झंडा के सहयोगी बन्दूको से लैस होकर घोडो पर चलते थे| उसके प्रमुख साथियों में बील गांव का बलवंत जाट, बूबकपुर का मोमराज कुम्हार, मथुरापुर का गोविन्द गूजर, जानी-बलैनी का एक वाल्मीकि और एक सक्का जाति का मुसलमान थे| रासना, बाडम और पथोली गांव झंडा के विशेष समर्थक थे| रासना के पास ही उसने एक कुटी में अपना गुप्त ठिकाना बना रखा था| इलाके में प्रचलित मिथकों के अनुसार झंडा ने पंजाब और राजस्थान तक धावे मारे और अंग्रेजी सत्ता को हिला कर रख दिया| झंडा की चौक-चांदनी स्थिति कुछ ऐसे बयां करती हैं-

गंग नहर के बायीं ओर
जहाँ रहता था झंडा अडीमोर
ज्यो-ज्यो झंडा डाका डाले
अंग्रेजो की गद्दी हाले.......

ज्यो-ज्यो झंडा चाले था
अंग्रेजो का दिल हाले था.........

झंडा को आज भी किसान श्रद्धा और सम्मान से याद करते हैं| उसने मुख्य रूप से साहूकारों को निशाना बनाया, वह उनके बही खाते जला देता था| जिनके जेवर साहूकारो ने गिरवी रख रखे थे उन्हें छीन कर वापिस कर देता था और पैसा गरीबो में बाँट देता था| वो गरीब अनाथ लड़कियों के भात भरता था| उसने अंग्रेजी पुलिस की मौजूदगी में मढीयाई गांव की दलित लड़की का भात दिया था| कहते हैं कि वो जनाने वेश में आया था, भात देकरदेकर निकल गया| अंग्रेज हाथ मलते रह गए| झंडा और साहूकारों की इस लड़ाई में वर्ग संघर्ष की प्रति छाया दिखाई देती हैं| साहूकारों के विरुद्ध झंडा कि ललकार पर चौक- चांदनी कहती हैं-

जब झंडा पर तकादा आवे
झंडा नहीं सीधा बतलावे
साहूकारों से यह कह दीना
मैं भी किसी माई का लाल
मारू बोड उदा दू खाल
हो होशियार तुम अपने घर बैठो
एक बार फिर मेरा जौहर देखो ............

झंडा ने मेरठ इलाके में अंग्रेजी राज को हिला कर रख दिया था| अंग्रेजी शासन ने ज़मींदारो और साहूकारों को झंडा के कहर से बचाने के लिए पूरी ताकत झोक दी| सरकार ने बूबकपुर में ही एक पुलिस चोकी खोल दी| इस स्थान पर आज प्राथमिक स्कूल हैं| लेकिन इस सब के बावजूद झंडा बेबाक होकर बूबकपुर में भूमिया पर भेली चढाने आता रहा| होली-दिवाली पर भी वह अपने गांव जरूर आता था| अंग्रेजी पुलिस और झंडा के टकराव पर चौक-चांदनी कहती हैं-

एक तरफ पुलिस का डंका
दूजी तरफ झंडा का डंका
अंग्रेज अफसर कहाँ तक जोर दिखावे
अपना सिर उस पर कटवावे...........

एक दिन रासना गांव के एक मुखबिर ने पुलिस को झंडा के रासना के जंगल स्थित कुटी में मौजूद होने की सूचना दी| पुलिस ने कुटी को चारो ओर से घेर लिया| झंडा अंग्रेजो से बड़ी बहादुरी से लड़ा| दोनों ओर से भीषण गोला-बारी हुई| गोला-बारी के शांत होने पर जब अंग्रेज कुटी में घुसे तो उन्हें वहाँ कोई नहीं मिला, झंडा वहाँ से जा चुका था| परन्तु उस घटना के बाद उसका नाम फिर कभी नहीं सुना गया| आज भी ये स्थान झंडा वाली कुटी के नाम से मशहूर हैं| यहाँ देवी माँ का एक मंदिर हैं और एक आश्रम हैं| यहाँ चैत्र के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मेला लगता हैं, जिसमे आस-पास के गांवों के लोग आते हैं जो भी आज भी झंडा को याद करते हैं और उसकी चर्चा करते हैं|

सन्दर्भ
1. श्री रामकिशन पुत्र श्री हरकेश, ग्राम बुबकपुर, निकट सरधना, मेरठ द्वारा दिनांक 11-4-10 ग्राम बूबकपुर में दिया गया साक्षात्कार
2. श्री अशोक कुमार पुत्र श्री चन्दन सिंह, ग्राम बूबकपुर, निकट सरधना, मेरठ द्वारा दिनांक 11-4-10 ग्राम बूबकपुर में दिया गया साक्षात्कार
3. श्री छज्जू कुम्हार, ग्राम बूबकपुर निकट सरधना, मेरठ द्वारा दिनांक 11-4-10 ग्राम बूबकपुर में दिया गया साक्षात्कार
4. श्री ब्रह्मजीत पुत्र श्री तिलकराम, ग्राम बूबकपुर, निकट सरधना, मेरठ द्वारा दिनांक 11-4-10 ग्राम बूबकपुर में दिया गया साक्षात्कार
5. श्री गोपीचंद, ग्राम बूबकपुर निकट सरधना, मेरठ द्वारा दिनांक 11-4-10 ग्राम बूबकपुर में दिया गया साक्षात्कार
6. श्री प्रहलाद सिंह पुत्र श्री बीरबल, ग्राम बूबकपुर, निकट सरधना, मेरठ द्वारा दिनांक 11-4-10 ग्राम बूबकपुर में दिया गया साक्षात्कार
7. श्री सूरजभान सिंह, ग्राम रासना, निकट सरधना, मेरठ द्वारा दिनांक 11-4-10 ग्राम रासना में दिया गया साक्षात्कार
8. श्री चन्दन सिंह, ग्राम बूबकपुर, निकट सरधना, मेरठ द्वारा उपलब्ध कराये गए झंडा की चौक- चांदनी के अंश

विशेष सहयोग- श्री राजीव सिंह (ग्राम बूबकपुर), श्री अशोक चौधरी (मेरठ), कैप्टन विजय सिंह धामा (मेरठ), श्री भूषण सिंह (ग्राम-बूबकपुर)

सोमवार, 5 नवंबर 2012

सूर्य उपासक सम्राट कनिष्क

                                                                                                                             डा.सुशील भाटी


                                                                             
                                                                              प्रवक्ता,इतिहास विभाग,
                                                                              राजकीय महाविद्यालय लक्सर,
                                                                              हरिद्वार (उत्तराखंड)          

यूँ तो भारत में सूर्य पूजा का प्रचलन सिन्धु घाटी की सभ्यता और वैदिक काल से ही है, परन्तु ईसा की प्रथम शताब्दी में, मध्य एशिया से भारत आए, कुषाण कबीलों ने इसे यहाँ विशेष रूप से लोकप्रिय बनाया। भारत में शक संवत’ (127 0) का प्रारम्भ करने वाले कुषाण सम्राट कनिष्ट की गणना भारत ही नहीं एशिया के महानतम शासकों में की जाती है। इसका साम्राज्य मध्य एशिया के आधुनिक उजबेकिस्तान तजाकिस्तान, चीन के आधुनिक सिक्यांग एवं कांसू प्रान्त से लेकर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और समस्त उत्तर भारत में बिहार एवं उड़ीसा तक फैला था। कनिष्क ने देवपुत्र शाहने शाही की उपाधि धारण की थी। भारत आने से पहले कुषाण बैक्ट्रियामें शासन करते थे, जो कि उत्तरी अफगानिस्तान एवं दक्षिणी उजबेगकिस्तान एवं दक्षिणी तजाकिस्तान में स्थित था और यूनानी एवं ईरानी संस्कृति का एक केन्द्र था। भारत आने से पहले कुषाण हिन्द-ईरानी समूह की भाषा बोलते थे और वे मुख्य रूप से मिहिर (सूर्य) के उपासक थे। सूर्य का एक पर्यायवाची मिहिरहै, जिसका अर्थ है, वह जो धरती को जल से सींचता है, समुद्रों से आर्द्रता खींचकर बादल बनाता है। कुषाण सम्राट कनिष्क ने अपने सिक्कों पर, यूनानी भाषा और  लिपि में मीरों (मिहिर) को उत्टंकित कराया था, जो इस बात का प्रतीक है कि ईरान के सौर सम्प्रदाय भारत में प्रवेश कर गया था। ईरान में मिथ्र या मिहिर पूजा अत्यन्त लोकप्रिय थी। भारत में सिक्कों पर सूर्य का अंकन किसी शासक द्वारा पहली बार हुआ था। सम्राट कनिष्क के सिक्के में सूर्यदेव बायीं और खड़े हैं। बांए हाथ में दण्ड है जो रश्ना सें बंधा है। कमर के चारों ओर तलवार लटकी है। सूर्य ईरानी राजसी वेशभूषा में है।  पेशावर के पास शाह जी की ढेरी नामक स्थान पर कनिष्क द्वारा निमित एक बौद्ध स्तूप के अवशेषों से एक बक्सा प्राप्त हुआ जिसे कनिष्कास कास्केटकहते हैं, इस पर सम्राट कनिष्क के साथ सूर्य एवं चन्द्र के चित्र का अंकन हुआ है। इस कास्केटपर कनिष्क के संवत का प्रथम वर्ष अंकित है।  मथुरा के सग्रहांलय में लाल पत्थर की अनेक सूर्य प्रतिमांए रखी है, जो कुषाण काल (पहली से तीसरी शताब्बी ईसवीं) की है। इनमें भगवान सूर्य को चार घोड़ों के रथ में बैठे दिखाया गया है। वे कुर्सी पर बैठने की मुद्रा में पैर लटकाये हुये है। उनके दोनों हाथों में कमल की एक-एक कली है और उनके दोनों कन्धों पर सूर्य-पक्षी गरूड़ जैसे दो छीटे-2 पंख लगे हुए हैं। उनका शरीर औदिच्यवेशअर्थात् ईरानी ढंग की पगड़ी, कामदानी के चोगें (लम्बा कोट) और सलवार से ढका है और वे ऊंचे ईरानी जूते पहने हैं। उनकी वेशभूषा बहुत कुछ, मथुरा से ही प्राप्त, सम्राट कनिष्क की सिरविहीन प्रतिमा जैसी है। भारत में ये सूर्य की सबसे प्राचीन मूर्तियां है। कुषाणों से पहली सूर्य की कोई प्रतिमा नहीं मिली है, भारत में उन्होंने ही सूर्य प्रतिमा की उपासना का चलन आरम्भ किया और उन्होेने ही सूर्य की वेशभूषा भी वैसी दी थी जैसी वो स्वयं धारण करते थे।  भारत में पहले सूर्य मन्दिर की स्थापना मुल्तान में हुई थी जिसे कुषाणों ने बसाया था। भविष्य, साम्व एवं वराह पुराण में वर्णन आता है कि भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब ने मुल्तान में पहले सूर्य मन्दिर की स्थापना की थी। किन्तु भारतीय ब्राह्मणों ने वहाँ पुरोहित का कार्य करने से मना कर दिया, तब नारद मुनि की सलाह पर साम्ब ने संकलदीप (सिन्ध) से मग ब्राह्मणों को बुलवाया, जिन्होंने वहाँ पुरोहित का कार्य किया। पुरातत्वेत्ता एं0 कनिघम का मानना हैै कि मुल्तान का सबसे पहला नाम कासाप्पुर था और उसका यह नाम कुषाणों से सम्बन्धित होने के कारण पड़ा। भविष्य पुराण के अनुसार मग ब्राह्मण जरसस्त के वंशज है, जिसके पिता स्वयं सूर्य थे और माता नक्षुभा मिहिरगौत्र की थी। मग ब्राह्मणों के आदि पूर्वज जरसस्त का नाम, छठी शताब्दी ई0 पू0 में, ईरान में पारसी धर्म की स्थापना करने वाले जुरथुस्त से अद्भुत साम्य रखता है। प्रसिद्ध इतिहासकार डी0 आर0 भण्डारकर (1911 0) के अनुसार मग ब्राह्मणों ने सम्राट कनिष्क के साथ ही, सूर्य एवं अग्नि के उपासक पुरोहितों के रूप में, भारत में प्रवेश किया। उसके बाद ही उन्होंने कासाप्पुर (मुल्तान) में पहली सूर्य प्रतिमा की स्थापना की।  दक्षिणी राजस्थान में स्थित प्राचीन भिनमाल नगर में सूर्य देवता के प्रसिद्ध जगस्वामी मन्दिर का निर्माण काश्मीर के राजा कनक (सम्राट कनिष्क) ने कराया था। मारवाड़ एवं उत्तरी गुजरात कनिष्क के साम्राज्य का हिस्सा रहे थे। भिनमाल के जगस्वामी मन्दिर के अतिरिक्त कनिष्क ने वहाँ करडानामक झील का निर्माण भी कराया था। भिनमाल से सात कोस पूर्व ने कनकावती नामक नगर बसाने का श्रेय भी कनिष्क को दिया जाता है। कहते है कि भिनमाल के वर्तमान निवासी देवड़ा/देवरा लोग एवं श्रीमाली ब्राहमण कनक के साथ ही काश्मीर से आए थे। देवड़ा/देवरा, लोगों का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उन्होंने जगस्वामी सूर्य मन्दिर बनाया था। राजा कनक से सम्बन्धित होने के कारण उन्हें सम्राट कनिष्क की देवपुत्र उपाधि से जोड़ना गलत नहीं होगा। सातवी शताब्दी में यही भिनमाल नगर गुर्जर देश (आधुनिक राजस्थान में विस्तृत) की राजधानी बना।  यहाँ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि एक कनिघंम ने आर्केलोजिकल सर्वे रिपोर्ट 1864 में कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की है और उसने माना है कि गुर्जरों के कसाना गौत्र के लोग कुषाणों के वर्तमान प्रतिनिधि है। उसकी बात का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि गुर्जरों का कसाना गोत्र क्षेत्र विस्तार एवं संख्याबल की दृष्टि से सबसे बड़ा है। कसाना गौत्र अफगानिस्तान से महाराष्ट्र तक फैला है और भारत में केवल गुर्जर जाति में मिलता है।  कनिष्क ने भारत में कार्तिकेय की पूजा को आरम्भ किया और उसे विशेष बढ़ावा दिया। उसने कार्तिकेय और उसके अन्य नामों-विशाख, महासेना, और स्कन्द का अंकन भी अपने सिक्कों पर करवाया। आधुनिक पंचाग में सूर्य षष्ठी एवं कार्तिकेय जयन्ती एक ही दिन पड़ती है, कोई चीज है प्रकृति में जिसने इन्हें एक साथ जोड़ा है-वह है सम्राट कनिष्क की आस्था। सूर्य षष्ठी के दिन सूर्य उपासक सम्राट कनिष्क को भी याद किया जाना चाहिये और उन्हें भी श्रद्धांजलि दी जानी चाहिये।   

  सन्दर्भ
1. भगवत शरण उपाध्याय, भारतीय संस्कृति के स्त्रोत, नई दिल्ली, 1991, 
2. रेखा चतुर्वेदी भारत में सूर्य पूजा-सरयू पार के विशेष सन्दर्भ में (लेख)  जनइतिहास शोध पत्रिका, खंड-1 मेरठ, 2006
3. 0 कनिंघम आर0 के0 लोजिकल सर्वे रिपोर्ट, 1864
4. के0 सी0 ओझा, दी हिस्ट्री आफ फाॅरेन रूल इन ऐन्शिऐन्ट इण्डिया, इलाहाबाद, 1968  
5. डी0 आर0 भण्डारकर, फारेन एलीमेण्ट इन इण्डियन पापुलेशन (लेख), इण्डियन ऐन्टिक्वैरी खण्ड ग् स्ए 1911
6. जे0 एम0 कैम्पबैल, भिनमाल (लेख), बोम्बे गजेटियर खण्ड 1 भाग 1, बोम्बे, 1896

भारतीय राष्ट्रीय संवत- शक संवत 2


                                                डा. सुशील भाटी
                                           प्रवक्ता, इतिहास विभाग,
                                 राजकीय महाविद्यालय लक्सर,हरिद्वार
                                             मो. 09411445677

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कनिष्क के राज्य काल में भारत में व्यापार और उद्योगों में अभूतपूर्व तरक्की हुई क्योकि मध्य एशिया स्थित रेशम मार्ग जिससे यूरोप और चीन के बीच रेशम का व्यापार होता था उस पर कनिष्क का कब्ज़ा था| भारत के बढते व्यापार और आर्थिक उन्नति के इस काल में तेजी के साथ नगरीकरण हुआ| इस समय पश्चिमिओत्तर भारत में करीब 60 नए नगर बसे और पहली बार भारत में कनिष्क ने ही बड़े पैमाने सोने के सिक्के चलवाए|

कुषाण/कसाना समुदाय एवं उनका नेता कनिष्क मिहिर (सूर्य) और अतर (अग्नि) के उपासक थे| उसके विशाल साम्राज्य में विभिन्न धर्मो और रास्ट्रीयताओं के लोग रहते थे| किन्तु कनिष्क धार्मिक दृष्टीकोण से बेहद उदार था, उसके सिक्को पर हमें भारतीय, ईरानी-जुर्थुस्त और ग्रीको-रोमन देवी देवताओं के चित्र मिलते हैं| बाद के दिनों में कनिष्क बोद्ध मत के प्रभाव में आ गया| उसने कश्मीर में चौथी बोद्ध संगति का आयोज़न किया, जिसके फलस्वरूप बोद्ध मत कि महायान शाखा का उदय हुआ| कनिष्क के प्रयासों और प्रोत्साहन से बोद्ध मत मध्य एशिया और चीन में फ़ैल गया, जहाँ से इसका विस्तार जापान और कोरिया आदि देशो में हुआ| इस प्रकार गौतम बुद्ध, जिन्हें भगवान विष्णु का नवा अवतार माना जाता हैं, उनके मत का प्रभाव पूरे एशिया में व्याप्त हो गया और भारत के जगद गुरु होने का उद् घोष विश्व की हवाओ में गूजने लगा|
कनिष्क के दरबार में अश्वघोष, वसुबंधु और नागार्जुन जैसे विद्वान थे| आयुर्विज्ञानी चरक और श्रुश्रत कनिष्क के दरबार में आश्रय पाते थे| कनिष्क के राज्यकाल में संस्कृत सहित्य का विशेष रूप से विकास हुआ| भारत में पहली बार बोद्ध साहित्य की रचना भी संस्कृत में हुई| गांधार एवं मथुरा मूर्तिकला का विकास कनिष्क महान के शासनकाल की ही देन हैं| 
     
मौर्य एवं मुग़ल साम्राज्य की तरह कुषाण/कसाना वंश ने लगभग दो शताब्दियों (५०-२५० इस्वी) तक उनके जितने ही बड़े साम्राज्य पर शान से शासन किया| कनिष्क का शासनकाल इसका चर्मोत्कर्ष था| कनिष्क भारतीय जनमानस के दिलो दिमाग में इस कदर बस गया की वह एक मिथक बन गया| तह्कीके - हिंद का लेखक अलबरूनी १००० इस्वी के लगभग भारत आया तो उसने देखा की भारत में यह मिथक प्रचलित था कि कनिष्क की ६० पीढियों ने काबुल पर राज किया हैं| कल्हण ने बारहवी शताब्दी में कश्मीर का इतिहास लिखा तो वह भी कनिष्क और उसके बेटे हुविष्क कि उपलब्धियों को बयां करता दिखलाई पड़ता हैं| कनिष्क के नाम की प्रतिष्ठा हजारो वर्ष तक कायम रही, यहाँ तक कि भारत के अनेक राजवंशो की वंशावली कुषाण काल तक ही जाती हैं| क्या ये महज़ एक इत्तेफाक हैं कि मेवाड़ के सिसोदिया और टिहरी के पंवार अपना पूर्वज किसी कनक को मानते हैं? शाकुम्भरी के चौहान अपना पूर्वज किसी वासुदेव को मानते हैं, जबकि कनिष्क के पौत्र का नाम भी वासुदेव था|
शक संवत का भारत में सबसे व्यापक प्रयोग अपने प्रिय सम्राट के प्रति प्रेम और आदर का सूचक हैं, और उसकी कीर्ति को अमर करने वाला हैं| प्राचीन भारत के महानतम ज्योतिषाचार्य वाराहमिहिर (५०० इस्वी) और इतिहासकार कल्हण (१२०० इस्वी) अपने कार्यों में शक संवत का प्रयोग करते थे| उत्तर भारत में कुषाणों और शको के अलावा गुप्त सम्राट भी मथुरा के इलाके में शक संवत का प्रयोग करते थे| दक्षिण के चालुक्य और राष्ट्रकूट और राजा भी अपने अभिलेखों और राजकार्यो में शक संवत का प्रयोग करते थे|

मध्य एशिया कि तरफ से आने वाले कबीलो को भारतीय सामान्य तौर पर शक कहते थे, क्योकि कुषाण भी मध्य एशिया से आये थे इसलिए उन्हें भी शक समझा गया और कनिष्क कुषाण/कसाना द्वारा चलाया गया संवत शक संवत कहलाया| इतिहासकार फुर्गुसन के अनुसार अपने कुषाण अधिपतियो के पतन के बाद भी उज्जैन के शको द्वारा कनिष्क के संवत के लंबे प्रयोग के कारण इसका नाम शक संवत पड़ा|
शक संवत की लोकप्रियता का एक कारण इसका उज्जैन के साथ जुड़ाव भी था, क्योकि यह नक्षत्र विज्ञानं और ज्योतिष का भारत में सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र था| मालवा और गुजरात के जैन जब दक्षिण के तरफ फैले तो वो शक संवत को अपने साथ ले गए, जहाँ यह आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं| दक्षिण भारत से यह दक्षिण पूर्वी एशिया के कम्बोडिया और जावा तक प्रचलित हो गया| जावा के राजदरबार में तो इसका प्रयोग १६३३ इस्वी तक होता था, जब वहा पहली बार इस्लामिक कैलेंडर को अपनाया गया| यहाँ तक कि फिलीपींस से प्राप्त प्राचीन ताम्रपत्रों में भी शक संवत का प्रयोग किया गया हैं|
                    
                      शक संवत एवं विक्रमी संवत
शक संवत और विक्रमी संवत में महीनो के नाम और क्रम एक ही हैं- चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ, आसाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, पौष, अघन्य, माघ, फाल्गुन| दोनों ही संवतो में दो पक्ष होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष| दोनों संवतो में एक अंतर यह हैं कि जहाँ विक्रमी संवत में महीना पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष से शुरू होता हैं, वंही शक संवत में महीना अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू होते हैं| उत्तर भारत में दोनों ही संवत चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को आरम्भ होते हैं, जोकि शक संवत के चैत्र माह की पहली तारीख होती हैं, किन्तु यह विक्रमी संवत के चैत्र की १६ वी तारीख होती हैं, क्योकि विक्रमी संवत के चैत्र माह के कृष्ण पक्ष के पन्द्रह दिन बीत चुके होते हैं| गुजरात में तो विक्रमी संवत कार्तिक की अमावस्या के अगले दिन से शुरू होता हैं|

                                 सन्दर्भ
  1. U P  Arora , Ancient India: Nurturants of Composite culture,  Papers from The Aligarh Historians Society , Editor Irfan Habib, Indian History Congress, 66th sessions , 2006.
  2. A L Basham, The wonder that was India, Calcutta, 1991.
  3. Shri Martand Panchangam, Ruchika Publication, Khari Bawli, Delhi, 2012.
  4. Rama Shankar Tripathi, History of Ancient India, Delhi, 1987.
  5. D N Jha & K M Shrimali, Prachin Bharat ka  Itihas, Delhi University, 1991.
  6. Prameshwari lal Gupta, Prachin Bhartiya Mudrae,Varanasi, 1995.
  7. Lalit Bhusan, Bharat Ka Rastriya Sanvat- Saka Sanvat,Navbharat Times, 11 April 2005.
  8. Indian National Calendar- Wikipedia http://en.wikipedia.org/wiki/Indian_national_calendar
  9. The Hindu Calendar System -http://hinduism.about.com/od/history/a/calendar.htm,
  10. Kanishka; the Saka Era, art and literature-http://articles.hosuronline.com/articleD.asp?pID=958&PCat=8
  11. Hindu Calendar- Wikipedia –
  1. 22 March: This Date in History-

भारतीय राष्ट्रीय संवत- शक संवत


भारतीय राष्ट्रीय संवत- शक संवत
                                       
                                                डा. सुशील भाटी
                                           प्रवक्ता, इतिहास विभाग,
                                 राजकीय महाविद्यालय लक्सर,हरिद्वार
                                             मो. 09411445677
शक संवत भारत का राष्ट्रीय संवत हैं| इस संवत को कुषाण/कसाना सम्राट कनिष्क महान ने अपने राज्य रोहण के उपलक्ष्य में 78 इस्वी में चलाया था| इस संवत कि पहली तिथि चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा होती हैं जोकि भारत के विश्व विख्यात सम्राट कनिष्क महान के राज्य रोहण की वर्ष गाठ हैं| शक संवत में कुछ ऐसी विशेषताए हैं जो भारत में प्रचलित किसी भी अन्य संवत में नहीं हैं जिनके कारण भारत सरकार ने इसे भारतीय राष्ट्रीय संवत का दर्ज़ा प्रदान किया हैं|
 भारत नस्लीय, भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता वाला विशाल देश हैं, जिस कारण आज़ादी के समय यहाँ अलग-अलग प्रान्तों में विभिन्न  संवत चल रहे थे| भारत सरकार के सामने यह समस्या थी कि किस संवत को  भारत का अधिकारिक संवत का दर्जा दिया जाए| वस्तुत भारत सरकार ने सन 1954 में संवत सुधार समिति(Calendar Reform Committee) का गठन किया जिसने देश प्रचलित 55 संवतो की पहचान की| कई बैठकों में हुई बहुत विस्तृत चर्चा के बाद संवत सुधार समिति ने स्वदेशी संवतो में से शक संवत को अधिकारिक राष्ट्रीय संवत का दर्जा प्रदान करने कि अनुशंषा की, क्योकि  प्राचीन काल में यह संवत भारत में सबसे अधिक प्रयोग किया जाता था| शक संवत भारतीय संवतो में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक, सही तथा त्रुटिहीन हैं, शक संवत प्रत्येक साल 22 मार्च को शुरू होता हैं, इस दिन सूर्य विश्वत रेखा पर होता हैं तथा दिन और रात बराबर होते हैं| शक संवत में साल 365 दिन होते हैं और इसका लीप इयर ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ ही पड़ता हैं| लीप इयर में यह 23 मार्च को शुरू होता हैं और इसमें ग्रेगोरियन कैलेंडर की तरह 366 दिन होते हैं|
पश्चिमीग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ, शक संवत भारत सरकार द्वारा कार्यलीय उपयोग लाया जाना वाला अधिकारिक संवत हैं| शक संवत का प्रयोग भारत के गज़ट प्रकाशन और आल इंडिया रेडियो के समाचार प्रसारण में किया जाता हैं| भारत सरकार द्वारा ज़ारी कैलेंडर, सूचनाओ और संचार हेतु भी शक संवत का ही प्रयोग किया जाता हैं|

जहाँ तक शक संवत के ऐतिहासिक महत्त्व कि बात हैं, इसे भारत के विश्व विख्यात सम्राट कनिष्क महान ने अपने राज्य रोहण के उपलक्ष्य में चलाया था| कनिष्क एक बहुत विशाल साम्राज्य का स्वामी था| उसका साम्राज्य मध्य एशिया स्थित काला सागर से लेकर पूर्व में उडीसा तक तथा उत्तर में चीनी तुर्केस्तान से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक फैला हुआ था| उसके साम्राज्य में वर्तमान उत्तर भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान के हिस्सा, तजाकिस्तान का हिस्सा और चीन के यारकंद, काशगर और खोतान के इलाके थे| कनिष्क भारतीय इतिहास का एक मात्र सम्राट हैं जिसका राज्य दक्षिणी एशिया के बाहर मध्य एशिया और चीन के हिस्सों को समाये था| वह इस साम्राज्य पर चार राजधानियो से शासन करता था| पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) उसकी मुख्य राजधानी थी| मथुरा, तक्षशिला और बेग्राम उसकी अन्य राजधानिया थी| कनिष्क इतना शक्तिशाली था कि उसने चीन के सामने चीनी राजकुमारी का विवाह अपने साथ करने का प्रस्ताव रखा, चीनी सम्राट द्वारा इस विवाह प्रस्ताव को ठुकराने पर कनिष्क ने चीन पर चढाई कर दी और यारकंद, काशगार और खोतान को जीत लिया|

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012


गुर्जर

मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
(गुज्जर से अनुप्रेषित)

गुर्जर समाज, प्राचीन एवं प्रतिष्ठित समाज में से एक है। यह समुदाय गुज्जर, गूजर, गोजर, गुर्जर, गूर्जर और वीर गुर्जर नाम से भी जाना जाता है। मुख्यत: गुर्जर उत्तर भारतपाकिस्तान और अफ़्ग़ानिस्तान में बसे हैं। इस जाति का नाम अफ़्ग़ानिस्तान के राष्ट्रगान में भी आता है। गुर्जरों के ऐतिहासिक प्रभाव के कारण उत्तर भारत और पाकिस्तान के बहुत से स्थान गुर्जर जाति के नाम पर रखे गए हैं, जैसे कि भारत का गुजरात राज्यपाकिस्तानी पंजाब का गुजरात ज़िला और गुजराँवाला ज़िला, और रावलपिंडी ज़िले का गूजर ख़ान शहर।

उत्पत्ति

गुर्जर अभिलेखो के हिसाब से ये सूर्यवंशी या रघुवंशी है। प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जरो को रघुकुल-तिलक तथा रघुग्रामिणी कहा है।[1] ७ वी से १० वी शतब्दी के गुर्जर शिलालेखो पर सुर्यदेव की कलाकर्तीया भी इनके सुर्यवन्शी होने की पुष्टि करती है।[2] राजस्थान में आज भी गुर्जरो को सम्मान से 'मिहिर' बोलते है, जिसका अर्थ 'सुर्य' होता है।[3][4] कुछ इतिहासकरो के अनुसार गुर्जर मध्य एशिया के कॉकस क्षेत्र (अभी के आर्मेनिया औरजॉर्जिया) से आए आर्य योद्धा थे। कुछ जानकार इन्हे विदेशी भी बताते है क्योन्कि गुर्जरो का नाम एक अभिलेख मे हूणों के साथ मिलता है, परन्तु इसका कोई एतिहासिक प्रमाण नही है।
संस्कृत के विद्वानों के अनुसार, गुर्जर शुद्ध संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ 'शत्रु का नाश करने वाला' अर्थात 'शत्रु विनाशक' होता है।[5][6] प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जर नरेश महिपाल को अपने महाकाव्य मे दहाडता गुर्जरकह कर सम्बोधित किया है।[7]
कुछ इतिहासकर कुषाणों को गुर्जर बताते है तथा कनिष्क के रबातक शिलालेख पर अन्कित 'गुसुर' को गुर्जर का ही एक रूप बताते है। उनका मानना है कि गुशुर या गुर्जर लोग विजेता के रूप मे भारत मे आये क्योन्कि गुशुर का अर्थ 'उच्च कुलिन' होता है।[8]

[संपादित करें]गुर्जर साम्राज्य

इतिहास के अनुसार ५वी शदी मे भीनमाल गुर्जर सम्राज्य की राजधानी थी तथा इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी। भरुच का सम्राज्य भी गुर्जरो के अधीन था। चीनी यात्रीह्वेन्सान्ग अपने लेखो मे गुर्जर सम्राज्य का उल्लेख करता है तथा इसे 'kiu-che-lo' बोलता है।[9] छठी से 12 वीं सदी में गुर्जर कई जगह सत्ता में थे। गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहारउत्तर प्रदेशमहाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी। मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बंगाल के पाल वंश और दक्षिण-भारत के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी। 12वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए। अरब आक्रान्तो ने गुर्जरो की शक्ति तथा प्रसाशन की अपने अभिलेखो मे भूरि-भूरि प्रशंसा की है।[10]
इतिहासकार बताते है कि मुगल काल से पहले तक लगभग पुरा राजस्थान तथा गुजरात, गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भुमि के नाम से जाना जाता था।[11]अरबलेखकों के अनुसार गुर्जर उनके सबसे भयंकर शत्रु थे तथा उन्होंने ये भी कहा है कि अगर गुर्जर नहीं होते तो वो भारत पर 12वीं सदी से पहले ही अधिकार कर लेते।[10]
१८वी सदी में भी गुर्जरो के कुछ छोटे छोटे राज्य थे। दादरी के गुर्जर राजा, दरगाही सिन्ह के अधीन १३३ ग्राम थे।मेरठ का राजा गुर्जर नैन सिन्ह था तथा उसने परिक्शित गढ का पुन्रनिर्माण करवाया था। भारत गजीटेयर के अनुसार १८५७ की क्रान्ति मे, गुर्जर तथा मुसलमान् रजपुत, ब्रिटिश के बहुत बुरे दुश्मन साबित हुए। गुर्जरो का १८५७ की क्रान्ति मे भी अहम योगदान रहा है। कोटवाल धानसिन्ह गुर्जर १८५७ की क्रान्ति का शहीद था।

[संपादित करें]आधुनिक स्थिति

प्राचीन काल में युद्ध कला में निपुण रहे गुर्जर मुख्य रूप से खेती और पशुपालन के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। गुर्जर अच्छे योद्धा माने जाते थे और इसीलिए भारतीय सेना में अभी भी इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है। गुर्जर महाराष्ट्र (जलगाँव जिला), दिल्लीराजस्थानहरियाणामध्य प्रदेशउत्तर प्रदेशहिमाचल प्रदेशजम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में फैले हुए हैं। राजस्थान में सारे गुर्जर हिंदू हैं। सामान्यत: गुर्जर हिन्दु , सिख, मुस्लिम आदि सभी धर्मो मे देखे जा सकते हैं। मुस्लिम तथा सिख गुर्जर, हिन्दु गुर्जरो से ही परिवर्तित हुए थे। पाकिस्तान में गुजरावालां, फैसलाबाद और लाहौर के आसपास इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है।

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य 2


व्यवस्थापक, शक्तिशाली शासक राजा भोज 

सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा,अक्षरधाम मंदिरदिल्‍ली
भारत कोष से साभार
प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक व्यवस्थापक, उस वंश का सबसे अधिक शक्तिशाली शासक राजा भोज था। हमें यह पता नहीं है कि भोज कब सिंहासन पर बैठा। उसके प्रारम्भिक जीवन के बारे में हमें पता इसलिए नहीं है क्योंकि नागभट्ट द्वितीय तथा राष्ट्रकूट शासक गोपाल तृतीय से पराजित होने के बाद प्रतिहार साम्राज्य का लगभग विघटन हो गया था। भोज ने धीरे धीरे फिर साम्राज्य की स्थापना की। उसने कन्नौज पर 836 ई. तक पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया और जो गुर्जर प्रतिहार वंश के अंत तक उसकी राजधानी बना रहा। राजा भोज ने गुर्जरत्रा (गुजरात क्षेत्र) (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भूमि (राजस्थान का कुछ भाग)     पर भी पुनः अपना प्रभुत्व स्थापित किया, लेकिन एक बार फिर गुर्जर प्रतिहारों को पाल तथा राष्ट्रकूटों का सामना करना पड़ा। भोज देवपाल से पराजित हुआ लेकिन ऐसा लगता है कि कन्नौज उसके हाथ से गया नहीं। अब पूर्वी क्षेत्र में भोज पराजित हो गया, तब उसने मध्य भारततथा दक्कन की ओर अपना ध्यान लगा दिया। गुजरात और मालवा पर विजय प्राप्त करने के अपने प्रयास में उसका फिर राष्ट्रकूटों से संघर्ष छिड़ गया।नर्मदा के तट पर एक भीषण युद्ध हुआ। लेकिन भोज मालवा के अधिकतर क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व क़ायम करने में सफल रहा। सम्भव है कि उसने गुजरात के कुछ हिस्सों पर भी शासन किया हो। हरियाणा के करनाल ज़िले में प्राप्त एक अभिलेख के अनुसार भोज ने सतलज नदी के पूर्वी तट पर कुछ क्षेत्रों को भी अपने अधीन कर लिया था। इस अभिलेख में भोज देव के शक्तिशाली और शुभ शासनकाल में एक स्थानीय मेले में कुछ घोड़ों के व्यापारियों द्वारा घोड़ों की चर्चा की गई है। इससे पता चलता है कि प्रतिहार शासकों और मध्य एशिया के बीच काफ़ी व्यापार चलता था। अरब यात्रियों ने बताया कि गुर्जर प्रतिहार शासकों के पास भारत में सबसे अच्छी अश्व सेना थी। मध्य एशिया तथा अरब के साथ भारत के व्यापार में घोड़ों का प्रमुख स्थान था। देवपाल की मृत्यु और उसके परिणामस्वरूप पाल साम्राज्य की कमज़ोरी का लाभ उठाकर भोज ने पूर्व में अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
दुर्भाग्यवश हमें भोज के व्यक्तिगत जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। भोज का नाम कथाओं में अवश्य प्रसिद्ध है। सम्भवतः उसके समसामयिक लेखक भोज के प्रारम्भिक जीवन की रोमांचपूर्ण घटनाओं, खोए हुए राज्य को फिर से प्राप्त करने के साहस, तथा कन्नौज की विजय से अत्यनत प्रभावित थे। किंतु भोज विष्णु का भक्त था और उसने 'आदिवराह' की पदवी ग्रहण की थी जो उसके सिक्कों पर भी अंकित है। कुछ समय बाद कन्नौज पर शासन करने वाले परमार वंश के राजा भोज, और प्रतिहार वंश के इस राजा भोज में अन्तर करने के लिए इसे कभी-कभी 'मिहिर भोज' भी कहा जाता है।
भोज की मृत्यु सम्भवतः 885 ई. में हुई। उसके बाद उसका पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम सिंहासन पर बैठा। महेन्द्रपाल ने लगभग 908-09 तक राज किया और न केवल भोज के राज्य को बनाए रखा वरन मगध तथा उत्तरी बंगाल तक उसका विस्तार किया। काठियावाड़, पूर्वी पंजाब और अवध में भी इससे सम्बन्धित प्रमाण मिले हैं। महेन्द्रपाल ने कश्मीर नरेश से भी युद्ध किया पर हार कर उसे भोज द्वारा विजित पंजाब के कुछ क्षेत्रों को कश्मीर नरेश को देना पड़ा।

अल मसूदी के अनुसार

इस प्रकार प्रतिहार नौवीं शताब्दी के मध्य से लेकिर दसवीं शताब्दी के मध्य, अर्थात एक सौ वर्षों तक उत्तरी भारत में शक्तिशाली बने रहे। बग़दाद निवासीअल मसूदी 915-16 में गुजरात आया था और उसने प्रतिहार शासकों, उनके साम्राज्य के विस्तार, और उनकी शक्ति की चर्चा की है। वह गुर्जर-प्रतिहार राज्य को अल-जुआर (गुर्जर का अपभ्रंश) और शासक को 'बौरा' पुकारता है। जो शायद आदिवराह का ग़लत उच्चारण है। यद्यपि यह पदवी राजा भोज की थी, जिसका इस समय तक देहान्त हो चुका था। अल मसूदी कहता है कि जुआर राज्य में 1,800,000 गाँव और शहर थे। इसकी लम्बाई 2,000 किलोमीटर थी और इतनी ही इसकी चौड़ाई थी। राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक अंग में सात लाख से लेकर नौ लाख सैनिक थे। अल मसूदी कहता है कि उत्तर की सेना से यह नरेश मुलतान के शासक और उसके मित्रों से युद्ध करता है, दक्षिण की सेना से राष्ट्रकूटों से तथा पूर्व की सेना से पालों से संघर्ष करता है। इसके पास युद्ध के लिए प्रशिक्षित केवल 2,000 हाथी थे लेकिन अश्व सेना देश में सबसे अच्छी थी। प्रतिहार शासक साहित्य तथा ज्ञान को बहुत प्रोत्साहित करते थे। महान संस्कृत कवि और नाटककार राजशेखर भोज के पौत्र महीपाल के दरबार में रहता था। प्रतिहारों ने कई सुन्दर भवनों और मन्दिरों का निर्माण कर कन्नौज की शोभा बढ़ाई। आठवीं-नौवीं शताब्दी के दौरान कई भारतीय विद्वान बग़दाद के ख़लीफ़ों के दरबार में गए। इन्होंन अरब में भारतीय विज्ञान, विशेषकर गणित, बीजगणित तथा चिकित्सा शास्त्र का प्रचार किया। हमें उन राजाओं के नाम का पता नहीं जो अपने दूतों और इन विद्वानों को बग़दाद भेजते थे। प्रतिहार सिंध के अरब शासकों के शत्रु के रूप में जाने जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा लगता है कि इस काल में भी भारत और पश्चिम एशिया के बीच विद्वानों और वस्तुओं का आदान-प्रदान जारी रहा।
राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र तृतीय ने 915 और 918 ई. के मध्य में एक बार फिर कन्नौज पर धावा बोल दिया। इससे प्रतिहार साम्राज्य कमज़ोर पड़ गया और सम्भवतः गुजरात पर राष्ट्रकूटों का अधिकार स्थापित हो गया क्योंकि अल मसूदी कहता है कि प्रतिहार साम्राज्य की समुद्र तक पहुँच नहीं थी। गुजरात, समुद्र के रास्ते होने वाले व्यापार का केन्द्र था तथा उत्तरी भारत से पश्चिम एशिया को जाने वाली वस्तुओं का प्रमुख द्वार था। गुजरात के हाथ से निकल जाने से प्रतिहारों को और भी धक्का लगा। महीपाल के बाद प्रतिहार साम्राज्य का धीरे-धीरे पतन हो गया। एक और राष्ट्रकूट सम्राट कृष्ण तृतीय ने 963 ई. में उत्तरी भारत पर आक्रमण कर प्रतिहार शासक को पराजित कर दिया। इसके शीघ्र बाद प्रतिहार साम्राज्य का विघटन हो गया।

संदर्भ

  1. Lālatā Prasāda Pāṇḍeya (1971) Sun-worship in ancient India। Motilal Banarasidass।
  2. ↑ Bombay (India : State) (1901) Gazetteer of the Bombay Presidency, Volume 9, Part 1। Govt. Central Press।
  3. ↑ Chandrasekharendra Saraswati (Jagatguru Sankaracharya of Kamakoti) (2001) Śri Śaṅkara Bhagavatpādācārya's Saundaryalaharī। Bharatiya Vidya Bhavan।
  4. ↑ New image of Rajasthan. Directorate of Public Relations, Govt. of Rajasthan. 1966. p. 2
  5. ↑ Rama Shankar Tripathi (1999). History of ancient India. Motilal Banarsidass Publ.. p. 318.

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य 1

गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना नागभट्ट नामक एक सामन्त ने 725 ई. में की थी। उसने राम के भाई लक्ष्मणको अपना पूर्वज बताते हुए अपने वंश को सूर्यवंश की शाखा सिद्ध किया। अधिकतर गुर्जर सूर्यवंश का होना सिद्द करते है तथा गुर्जरो के शिलालेखो पर अंकित सूर्यदेव की कलाकृर्तिया भी इनके सूर्यवंशी होने की पुष्टि करती है।[1]आज भी राजस्थान में गुर्जर सम्मान से मिहिर कहे जाते हैं, जिसका अर्थ सूर्य होता है।[2][3]विद्वानों का मानना है कि इन गुर्जरो ने भारतवर्ष को लगभग 300 साल तक अरब-आक्रन्ताओं से सुरक्षित रखकरप्रतिहार (रक्षक) की भूमिका निभायी थी, अत: प्रतिहार नाम से जाने जाने लगे।[4]।रेजर के शिलालेख पर प्रतिहारो ने स्पष्ट रूप से गुर्जर-वंश के होने की पुष्टि की है।[5]नागभट्ट प्रथम बड़ा वीर था। उसने सिंध की ओर से होने से अरबों के आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना किया। साथ ही दक्षिण के चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के आक्रमणों का भी प्रतिरोध किया और अपनी स्वतंत्रता को क़ायम रखा। नागभट्ट के भतीजे का पुत्र वत्सराजइस वंश का प्रथम शासक था, जिसने सम्राट की पदवी धारण की, यद्यपि उसने राष्ट्रकूट राजा ध्रुव से बुरी तरह हार खाई। वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने 816 ई. के लगभग गंगा की घाटी पर हमला किया, और कन्नौज पर अधिकार कर लिया। वहाँ के राजा को गद्दी से उतार दिया और वह अपनी राजधानी कन्नौज ले आया।
यद्यपि नागभट्ट द्वितीय भी राष्ट्रकूट राजा गोविन्द तृतीय से पराजित हुआ, तथापि नागभट्ट के वंशज कन्नौज तथा आसपास के क्षेत्रों पर 1018-19 ई. तक शासन करते रहे। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा भोज प्रथम था, जो कि मिहिरभोज के नाम से भी जाना जाता है और जो नागभट्ट द्वितीय का पौत्र था। भोज प्रथम ने (लगभग 836-86 ई.) 50 वर्ष तक शासन किया और गुर्जर साम्राज्य का विस्तार पूर्व में उत्तरी बंगाल से पश्चिम में सतलुज तक हो गया। अरब व्यापारी सुलेमान इसी राजा भोज के समय में भारत आया था। उसने अपने यात्रा विवरण में राजी की सैनिक शक्ति और सुव्यवस्थित शासन की बड़ी प्रशंसा की है। अगला सम्राट महेन्द्रपाल था, जो 'कर्पूरमंजरी' नाटक के रचयिता महाकवि राजेश्वर का शिष्य और संरक्षक था। महेन्द्र का पुत्र महिपाल भी राष्ट्रकूट राजा इन्द्र तृतीय से बुरी तरह पराजित हुआ। राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर क़ब्ज़ा कर लिया, लेकिन शीघ्र ही महिपाल ने पुनः उसे हथिया लिया। परन्तु महिपाल के समय में ही गुर्जर-प्रतिहार राज्य का पतन होने लगा। उसके बाद के राजाओं–भोज द्वितीय, विनायकपाल, महेन्द्रपाल द्वितीय, देवपाल, महिपाल द्वितीय और विजयपाल ने जैसे-तैसे 1019 ई. तक अपने राज्य को क़ायम रखा। देवपाल के शासन के अन्तिम दिनों में गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य की शक्ति बढ़ने लगी।
महमूद ग़ज़नवी के हमले के समय कन्नौज का शासक राज्यपाल था। राज्यपाल बिना लड़े ही भाग खड़ा हुआ। बाद में उसने महमूद ग़ज़नवी की अधीनता स्वीकार कर ली। इससे आसपास के गुर्जर राजा बहुत ही नाराज़ हुए। महमूद ग़ज़नवी के लौट जाने पर कालिंजर के चन्देल राजा गण्ड के नेतृत्व में गुर्जर राजाओं ने कन्नौज के राज्यपाल को पराजित कर मार डाला और उसके स्थान पर त्रिलोचनपाल को गद्दी पर बैठाया। महमूद के दोबारा आक्रमण करने पर कन्नौज फिर से उसके अधीन हो गया। त्रिलोचनपाल बाड़ी में शासन करने लगा। उसकी हैसियत स्थानीय सामन्त जैसी रह गयी। कन्नौज में गहड़वाल वंश अथवा राठौर वंश का उद्भव होने पर उसने 11वीं शताब्दी के द्वितीय चतुर्थांश में बाड़ी के गुर्जर-प्रतिहार वंश को सदा के लिए उखाड़ दिया। गुर्जर-प्रतिहार वंश के आन्तरिक प्रशासन के बारे में कुछ भी पता नहीं है। लेकिन इतिहास में इस वंश का मुख्य योगदान यह है कि इसने 712 ई. में सिंध विजय करने वाले अरबों को आगे नहीं बढ़ने दिया।

कनिष्‍क 2


राज्यविस्तार

भारत कोष से साभार
कनिष्क का सिक्का
कनिष्क ने कुषाण वंश की शक्ति का पुनरुद्धार किया। सातवाहन राजा कुन्तल सातकर्णि(विक्रमादित्य द्वितीय) के प्रयत्न से कुषाणों की शक्ति क्षीण हो गई थी। अब कनिष्क के नेतृत्व में कुषाण राज्य का पुनः उत्कर्ष हुआ। उसने उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम चारों दिशाओं में अपने राज्य का विस्तार किया। सातवाहनों को परास्त करके उसने न केवल पंजाब पर अपना आधिपत्य स्थापित किया, अपितु भारत के मध्यदेश को जीतकर मगध से भी सातवाहन वंश के शासन का अन्त किया। कुमारलात नामक एक बौद्ध पंडित ने कल्पना मंडीतिका नाम की एक पुस्तक लिखी थी, जिसका चीनी अनुवाद इस समय भी उपलब्ध है। इस पुस्तक में कनिष्क के द्वारा की गई पूर्वी भारत की विजय का उल्लेख है। श्रीधर्मपिटक निदान सूत्र नामक एक अन्य बौद्ध ग्रंथ में [2] लिखा है,  कि कनिष्क ने पाटलिपुत्र को जीतकर उसे अपने अधीन किया और वहाँ से प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान अश्वघोषऔर भगवान बुद्ध के कमण्डलु को प्राप्त किया। तिब्बत की बौद्ध अनुश्रुति में भी कनिष्क के साकेत(अयोध्या) विजय का उल्लेख है। इस प्रकार साहित्यिक आधार पर यह बात ज्ञात होती है कि कनिष्क एक महान विजेता था, और उसने उत्तरी भारत के बड़े भाग को जीतकर अपने अधीन कर लिया था। सातवाहन वंश का शासन जो पाटलिपुत्र से उठ गया, वह कनिष्क की विजयों का ही परिणाम था।
बौद्ध अनुश्रुति की यह बात कनिष्क के सिक्कों और उत्कीर्ण लेखों द्वारा भी पुष्ट होती है। कनिष्क के सिक्के उत्तरी भारत में दूर-दूर तक उपलब्ध हुए हैं। पूर्व में रांची तक से उसके सिक्के मिले हैं। इसी प्रकार उसके लेख पश्चिम में पेशावर से लेकर पूर्व में मथुरा और सारनाथ तक प्राप्त हुए हैं। उसके राज्य के विस्तार के विषय में ये पुष्ट प्रमाण हैं। सारनाथ में कनिष्क का जो शिलालेख मिला है, उसमें महाक्षत्रप ख़रपल्लान और क्षत्रप विनस्पर के नाम आए हैं। पुराणों में सातवाहन या आन्ध्र वंश के बाद मगध का शासक वनस्पर को ही लिखा गया है। यह वनस्पर कनिष्क द्वारा नियुक्त मगध का क्षत्रप था। महाक्षत्रप ख़रपल्लान की नियुक्ति मथुरा के प्रदेश पर शासन करने के लिए की गई थी।
उत्तरी भारत की यह विजय कनिष्क केवल अपनी शक्ति द्वारा नहीं कर सका था। तिब्बति अनुश्रुति के अनुसार ख़ोतन के राजा विजयसिंह के पुत्र विजयकीर्ति ने 'गुज़ान' राजा तथा राजा 'कनिष्क' के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण किया था, और सोकेत (साकेत) नगर जीत लिया था। 'गुज़ान' का अभिप्राय कुषाण से है, और कनिक का कनिष्क से। सातवाहन वंश की शक्ति को नष्ट करने के लिए कनिष्क को सुदूरवर्ती ख़ोतन राज्य के राजा से भी सहायता लेनी पड़ी थी। यह बात सातवाहन साम्राज्य की शक्ति को सूचित करती है।

नया पुष्पपुर

पाटलिपुत्र को जीतकर कनिष्क ने उसे अपने अधीन कर लिया था। अपने प्राचीन गौरव के कारण इसी नगरी को कनिष्क के साम्राज्य की राजधानी होना चाहिए था। पर कनिष्क का साम्राज्य बहुत विस्तृत था। उसकी उत्तरी सीमा चीन के साथ छूती थी। चीन की सीमा तक विस्तृत विशाल कुषाण साम्राज्य के लिए पाटलिपुत्र नगरी उपयुक्त राजधानी नहीं हो सकती थी। अतः कनिष्क ने एक नए कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) की स्थापना की, और उसे 'पुष्पपुर' नाम दिया। यही आजकल का पेशावर है।
पुष्पपुर में कनिष्क ने बहुत सी नई इमारतें बनवाईं। इनमें प्रमुख एक स्तूप था, जो चार सौ फीट ऊँचा था। इसमें तेरह मंज़िलें थीं। जब प्रसिद्ध चीनी यात्रीह्यू-एन-त्सांग महाराज हर्षवर्धन के शासन काल (सातवीं सदी) में भारत भ्रमण करने के लिए आया था, तो कनिष्क द्वारा निर्मित इस विशाल स्तूप को देखकर आश्चर्यचकित रह गया था। कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) के मुक़ाबले में कनिष्क ने पुष्पपुर को विद्या, धर्म और संस्कृति का केन्द्र बनाया। इसमें सन्देह नहीं कि कुछ समय के लिए पुष्पपुर के सम्मुख प्राचीन कुसुमपुर का वैभव मन्द पड़ गया था।

चीन से संघर्ष

कनिष्क केवल उत्तरी भारत की विजय से ही संतुष्ट नहीं हुआ, उसने मध्य एशिया के क्षेत्र में भी अपनी शक्ति के विस्तार का प्रयत्न किया। मध्य एशिया के ख़ोतन राज्य की सहायता से कनिष्क उत्तरी भारत की विजय कर सका था। इस युग में चीन के सम्राट इस बात के लिए प्रयत्नशील थे, कि अपने साम्राज्य का विस्तार करें। चीन के सुप्रसिद्ध सेनापति पान-चाऊ ने 73-78 ई. के लगभग साम्राज्य विस्तार के लिए दिग्विजय प्रारम्भ की, और मध्य एशिया पर अपना अधिकार कर लिया। पान-चाऊ की विजयों के कारण चीनी साम्राज्य की पश्चिमी सीमा कैस्पियन सागर तक जा पहुँची। इस दशा में यह स्वाभाविक था कि कुषाण राज्य भी चीन के निकट सम्पर्क में आए। पान-चाऊ की इच्छा थी, कि कुषाणों के साथ मैत्री सम्बन्ध स्थापित करे। इसलिए उसने विविध बहुमूल्य उपहारों के साथ अपने राजदूत कुषाण राजा के पास भेजे। कुषाण राजा ने इन दूतों का यथोचित स्वागत किया, पर चीन के साथ अपनी मैत्री को स्थिर रखने के लिए यह इच्छा प्रगट की कि चीनी सम्राट अपनी कन्या का विवाह उसके साथ कर दें। कुषाण राजा की इस माँग को पान-चाऊ ने अपने सम्राट के सम्मान के विरुद्ध समझा। परिणाम यह हुआ कि दोनों पक्षों में युद्ध प्रारम्भ हो गया और कुषाणों ने एक बड़ी सेना पान-चाऊ के विरुद्ध लड़ाई के लिए भेजी। पर इस युद्ध में यूची (युइशि) सेना की पराजय हुई।
पर कुषाण राजा इस पराजय से निराश नहीं हुआ। चीनी सेनापति पान-चाऊ की मृत्यु के बाद कनिष्क ने अपनी पहली पराजय का प्रतिशोध करने के लिए एक बार फिर चीन पर आक्रमण किया। इस बार वह सफल रहा और मध्य एशिया के अनेक प्रदेशों पर उसका आधिपत्य स्थापित हो गया। ख़ोतान और यारकन्द के प्रदेश इसी युद्ध में विजय होने के कारण कुषाणों के साम्राज्य में सम्मिलित हुए।

क्षत्रपों तथा महाक्षत्रपों की नियुक्ति

इतने विस्तृत साम्राज्य के शासन के लिए सम्राट् ने क्षत्रपों तथा महाक्षत्रपों की नियुक्ति की जिनका उल्लेख उसके लेखों में है। स्थानीय शासन संबंधी 'ग्रामिक' तथा 'ग्राम कूट्टक' और 'ग्रामवृद्ध पुरुष' और 'सेना संबंधी', 'दंडनायक' तथा 'महादंडनायक' इत्यादि अधिकारियों का भी उसके लेखों में उल्लेख है।

धर्म

कनिष्क के बहुत से सिक्के वर्तमान समय में उपलब्ध होते हैं। इन पर यवन (ग्रीक), जरथुस्त्री (ईरानी) और भारतीय सभी तरह के देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ अंकित हैं। ईरान के अग्नि (आतश), चन्द्र (माह) और सूर्य (मिहिर), ग्रीक देवता हेलिय, प्राचीन एलम की देवी नाना, भारत के शिव, स्कन्द वायु और बुद्ध - ये सब देवता उसके सिक्कों पर नाम या चित्र के द्वारा विद्यमान हैं। इससे यह सूचित है, कि कनिष्क सब धर्मों का समान आदर करता था, और सबके देवी-देवताओं को सम्मान की दृष्टि से देखता था। इसका यह कारण भी हो सकता है, कि कनिष्क के विशाल साम्राज्य में विविध धर्मों के अनुयायी विभिन्न लोगों का निवास था, और उसने अपनी प्रजा को संतुष्ट करने के लिए सब धर्मों के देवताओं को अपने सिक्कों पर अंकित कराया था। पर इस बात में कोई सन्देह नहीं कि कनिष्क बौद्ध धर्म का अनुयायी था, और बौद्ध इतिहास में उसका नाम अशोक के समान ही महत्त्व रखता है। आचार्य अश्वघोष ने उसे बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था। इस आचार्य को वह पाटलिपुत्र से अपने साथ लाया था, और इसी से उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी।
कनिष्क निश्चय ही एक महान योद्धा था जिसने पार्थिया से मगध तक अपना राज्य फैलाया, किन्तु उसका यश उसके बौद्ध धर्म के संरक्षक होने के कारण कहीं अधिक है। उसका निजी बौद्ध धर्म था। उसके प्रचार और संगठन के लिए उसने बहुत से कार्य किए। उसने पार्श्व के कहने से कश्मीर अथवा जलंधर में बौद्ध की चौथी महासंगीति (महासभा) का आयोजन किया जिसमें बहुत से विद्वानों ने भाग लिया। इसका उद्देश्य उन सिद्धांतों पर विचार करना था जिनके विषय में बौद्ध विद्वानों में मतभेद था। इस सभा में विद्वानों ने समस्त बौद्ध साहित्य पर टीकाएँ लिखवाईं। इस सभा का प्रधान वसुमित्र था और अश्वघोष ने इसमें भाग लिया था। कनिष्क यद्यपि स्वयं बौद्ध धर्मावलंबी था किन्तु वह अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु था। यह बात उसके सिक्कों से स्पष्ट है। उन पर कई पार्थियन, यूनानी तथा भारतीय देवी देवताओं की आकृतियाँ हैं। कुछ सिक्कों पर यूनानी ढंग से खड़े और कुछ पर भारतीय ढंग से बैठे बुद्ध की आकृतियाँ हैं। सम्भवतः ये सिक्के इस बात को प्रकट करते हैं कि उसके राज्य में इन सब धर्मों के रहने वाले थे और सम्राट इन सब धर्मों के प्रति सहिष्णु था। मथुरामें एक मूर्ति मिली है जिसमें कनिष्क को सैनिक पोशाक पहने खड़ा दिखाया गया है।
कनिष्क के सिक्के दो प्रकार के हैं -
  1. एक प्रकार के सिक्कों में यूनानी भाषा में उसका नाम आदि अंकित है।
  2. दूसरे में ईरानी भाषा में।
उसके ताँबे के सिक्कों में उसे एक वेदी पर बलिदान करते दिखाया गया है। उसके सोने के सिक्के रोम के सम्राटों के सिक्कों से मिलते जुलते हैं। जिनमें एक ओर उसकी अपनी आकृति है और दूसरी ओर किसी देवी या देवता की। पेशावर के निकट कनिष्क ने एक बड़ा स्तूप और मठ बनवाया, जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे गए। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि इस स्तूप का निर्माण एक यूनानी इंजीनियर ने कराया था।

बौद्धों की चौथी संगीति

कनिष्क के संरक्षण में बौद्ध धर्म की चौथी संगीति (महासभा) उसके शासन काल में हुई। कनिष्क ने जब बौद्ध धर्म का अध्ययन शुरू किया, तो उसने अनुभव किया कि उसके विविध सम्प्रदायों में बहुत मतभेद है। धर्म के सिद्धांतों के स्पष्टीकरण के लिए यह आवश्यक है, कि प्रमुख विद्वान एक स्थान पर एकत्र हों, और सत्य सिद्धांतों का निर्णय करें। इसलिए कनिष्क ने काश्मीर के कुण्डल वन विहार में एक महासभा का आयोजन किया, जिसमें 500 प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान सम्मिलित हुए। अश्वघोष के गुरु आचार्य वसुमित्र और पार्श्व इनके प्रधान थे। वसुमित्र को महासभा का अध्यक्ष नियत किया गया। महासभा में एकत्र विद्वानों ने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को स्पष्ट करने और विविध सम्प्रदायों के विरोध को दूर करने के लिए 'महाविभाषा' नाम का एक विशाल ग्रंथ तैयार किया। यह ग्रंथ बौद्ध त्रिपिटक के भाष्य के रूप में था। यह ग्रंथ संस्कृत भाषा में था और इसे ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण कराया गया था। ये ताम्रपत्र एक विशाल स्तूप में सुरक्षित रूप से रख दिए गए थे। यह स्तूप कहाँ पर था, यह अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है। यदि कभी इस स्तूप का पता चल सका, और इसमें ताम्रपत्र उपलब्ध हो गए, तो निःसन्देह कनिष्क के बौद्ध धर्म सम्बन्धी कार्य पर उनसे बहुत अधिक प्रकाश पड़ेगा। 'महाविभाषा' का चीनी संस्करण इस समय उपलब्ध है।

समकालीन विद्वान

कनिष्क के संरक्षण में न केवल बौद्ध धर्म की उन्नति हुई, अपितु अनेक प्रसिद्ध विद्वानों ने भी उसके राजदरबार में आश्रय ग्रहण किया। वसुमित्र, पार्श्व औरअश्वघोष के अतिरिक्त प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान नागार्जुन भी उसका समकालीन था। नागार्जुन बौद्ध धर्म का प्रसिद्ध दार्शनिक हुआ है, और महायान सम्प्रदाय का प्रवर्तक उसी को माना जाता है। उसे भी कनिष्क का संरक्षण प्राप्त था। आयुर्वेद का प्रसिद्ध आचार्य चरक भी उसके आश्रय में पुष्पपुर में निवास करता था।

कुषाण संस्कृति

कनिष्क की राजसभा में बड़े बड़े विद्वान विद्यमान थे। पार्श्व, वसुमित्र और अश्वघोष बौद्ध दार्शनिक थे। नागार्जुन जैसे प्रकांड पंडित और चरक जैसे चिकित्सक उसकी राजधानी के रत्न थे। उसके समय में 'महायान' धर्म का प्रचार होने से बौद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियाँ बनने लगीं। इस प्रकार कुषाणों की यद्यपि अपनी कोई विकसित संस्कृति नहीं थी किन्तु भारत में बसने पर उन्होंने भारतीय और यूनानी संस्कृति को अपना लिया और इस समन्वित संस्कृति को ऐसा प्रोत्साहन दिया कि वह खूब विकसित हुई। उत्तरी भारत की जनता को यूनानी, शक, पहलव, आदि आक्रमणों से अब मुक्ति मिली औरभारत में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित हुई। राजनीतिक शान्ति के इस काल में धर्म, साहित्य, कला, विज्ञान, व्यापार आदि सभी दिशाओं में खूब प्रगति हुई। वास्तव में गुप्त राजाओं से पूर्व कुषाण युग भारत के सांस्कृतिक विकास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

गंधार कला शैली

कनिष्क का नाम महायान बौद्ध धर्म के प्रश्रय एवं प्रचार प्रसार के साथ साथ गंधार कला शैली के विकास से सम्बद्ध है।

कुषाण साम्राज्य का ह्रास

कनिष्क के बाद कुषाण साम्राज्य का ह्रास प्रारम्भ हुआ। उसका उत्तराधिकारी हुविष्क था। वह सम्भवतः रुद्रदामा द्वारा पराजित हुआ और मालवा शकों के हाथ से चला गया। अगला शासक वसुदेव था। वह विष्णु एवं शिव का उपासक था। उसके समय में उत्तर पश्चिम का बहुत बड़ा भाग कुषाणों के हाथ से निकल गया। उसके उत्तराधिकारी कमज़ोर थे और ईरान में सासानियत वंश के तथा पूर्व में 'नाग भारशिव वंश' के उदय ने कुषाणों के पतन में बहुत योग दिया।

 टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  अफ़ग़ानिस्तान के राबाटक स्थान के उत्खनन में 1993 में मिला था। यह यूनानी लिपि और बॅक्ट्रियन भाषा में है।
  2.  इसका भी अब केवल चीनी अनुवाद ही प्राप्त होता है